اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : ग़म हो गये बेशुमार आका
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी गुलाम मुस्तफा कादरी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Dec, 2025 02:22 PM IST
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ग़म हो गये बेशुमार आका,
बंदा तेरे निसार आका
बिगड़ा जाता है खेल मेरा,
आका आका सवार आका
मंज्धार पे आके नाव टूटी,
दे हाथ की हूँ मैं पार आका
टूटी जाती है पीठ मेरी,
लिल्लाह ये बोझ उतार आका
हल्का है अगर हमारा पल्ला,
भारी है तेरा वक़ार आका
मजबूर हैं हम तो फ़िक्र क्या है,
तुमको तो है इख़्तियार आका
मैं दूर हूँ तुम तो हो मेरे पास,
सुन लो मेरी पुकार आका
मुझसा कोई ग़मज़दा ना होगा,
तुमसा नहीं ग़मगुसार आका
गर्दाब में पड़ गई है कश्ती,
डूबा डूबा, उतार आका
तुम वो कि करम को नाज़ तुम से,
मैं वो कि बदी को आर आका
फिर मुँह न पड़े कभी ख़िज़ाँ का,
दे दे ऐसी बहार आका
जिसकी मर्ज़ी ख़ुदा न टाले,
मेरा है वो नामदार आका
है मुल्के ख़ुदा पे जिसका क़ब्ज़ा,
मेरा है वो कामगार आका
सोया किये नाबकार बंदे,
रोया किये ज़ार ज़ार आका
क्या भूल है उनके होते कहलायें,
दुनिया के ये ताजदार आका
उनके अदना ग़दा पे मिट जायें,
ऐसे ऐसे हज़ार आका
बे-अब्र-ए करम के मेरे धब्बे,
ला तग़्सिलुहल-बिहार आका
इतनी रहमत रज़ा पे कर लो,
ला यक़रुबुहुल बवॉर आका
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यह कलाम आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान द्वारा लिखित एक अत्यंत भावुक इस्तिग़ासा (फरियाद) है। इसमें एक बेबस भक्त अपने दुखों और पापों के बोझ से मुक्ति पाने के लिए हुज़ूर ﷺ की शरण में गुहार लगा रहा है।
इन पंक्तियों में कवि कहता है कि मेरी जीवन-रूपी नैया मझधार में फँस गई है और दुखों ने मुझे घेर लिया है। वह हुज़ूर ﷺ से प्रार्थना करता है कि "हे आका! मैं मजबूर हूँ पर आप सामर्थ्यवान (इख़्तियार वाले) हैं, अपने करम का हाथ बढ़ाकर मेरी बिगड़ती किस्मत को संवार दीजिए।"
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निसार | न्योछावर या समर्पित |
| सवार | संवारना या ठीक करना |
| वक़ार | सम्मान या गरिमा |
| इख़्तियार | अधिकार या शक्ति |
| ग़मगुसार | दुख बाँटने वाला / हमदर्द |
| गर्दाब | भँवर (Whirlpool) |
| बदी | बुराई या पाप |
| नाबकार | निकम्मा या अपराधी |
इस नात का सार यह है कि संसार के सभी राजा और धनवान नबी ﷺ के एक साधारण भिखारी (ग़दा) के सामने कुछ भी नहीं हैं। कवि अपनी लाचारी का वर्णन करते हुए कहता है कि हुज़ूर ﷺ वह हस्ती हैं जिनकी इच्छा को स्वयं ईश्वर भी नहीं टालता, इसलिए वही उसके जीवन की डूबती कश्ती को किनारा लगा सकते हैं।
नात के मक़्ता (आखिरी हिस्से) में शायर "रज़ा" ने अपने गुनाहों के धब्बे धोने के लिए किस चीज़ की तलब की है, और उनकी आखिरी इल्तेजा क्या है?