मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 04 Aug, 2023 11:11 AM IST
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फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों,
दिल को जो अक़्ल दे ख़ुदा, तेरी गली से जाएँ क्यों।
रुख़्सते काफ़िला का शोर, गश से हमें उठाए क्यों,
सोते हैं उनके साए में, कोई हमें जगाए क्यों।
फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों,
दिल को जो अक़्ल दे ख़ुदा, तेरी गली से जाएँ क्यों।
बार न थे हबीब को, फलते ही ग़रीब को,
रोए जो अब नसीब को, चैन कहूँ गँवाएँ क्यों।
फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों।
देखकर हज़रत-ए-ग़नी, फैल पड़े ग़रीब भी,
छाई है अब तो चौनी, हश्र ही आ न जाए क्यों।
फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों।
जान है इश्क़-ए-मुस्तफ़ा, रोज़-फ़ज़ूँ करे ख़ुदा,
जिसको हो दर्द का मज़ा, नाज़-ए-दवा उठाए क्यों।
फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों।
है तेरी रज़ा निख़रा सितम, जुर्म पे गर लजाए क्यों,
कोई बजाए सोज़-ए-ग़म, साज़-ए-तरब बजाए क्यों।
फिर के गली-गली तबाह ठोकरें सबकी खाए क्यों,
दिल को जो अक़्ल दे ख़ुदा, तेरी गली से जाएँ क्यों
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यह सुप्रसिद्ध नात-ए-पाक (इमाम अहमद रज़ा ख़ान 'आला हज़रत' द्वारा रचित) मदीना शरीफ़ की गलियों और हुज़ूर ﷺ के पवित्र दर की महिमा को दर्शाती है, जहाँ पहुँचने के बाद एक भक्त को संसार की किसी और चीज़ की चाह नहीं रहती।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि यदि ईश्वर किसी को थोड़ी सी भी बुद्धि (अक़्ल) दे, तो वह भला हुज़ूर ﷺ की पवित्र गली को छोड़कर और कहीं क्यों भटकेगा? शायर कहता है कि जब हमें उनके करुणा भरे साए में सच्चा आराम और आत्मिक सुकून मिल गया है, तो हम यहाँ से कहीं और जाकर दुनिया भर की ठोकरें क्यों खाएँ।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| रुख़्सते काफ़िला | काफ़िले की विदाई या रवानगी |
| गश | बेहोशी / गहरी नींद |
| बार | बोझ या भार |
| हबीब | प्यारे नबी (हुज़ूर ﷺ) |
| हज़रत-ए-ग़नी | परम दानी / सब कुछ देने वाले (हुज़ूर ﷺ) |
| चौनी | छावनी / पनाहगाह या साया |
| रोज़-फ़ज़ूँ | दिन-प्रतिदिन बढ़ने वाला |
| साज़-ए-तरब | ख़ुशी का वाद्य यंत्र या संगीत |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ का प्रेम (इश्क़-ए-मुस्तफ़ा) ही एक सच्चे आस्तिक की असली जान है, और दुआ है कि यह प्रेम दिन-ब-दिन बढ़ता रहे। शायर कहते हैं कि जिसे नबी के प्रेम के मीठे दर्द का स्वाद मिल गया हो, वह दुनिया की झूठी ख़ुशियों (साज़-ए-तरब) का मोहताज नहीं होता; उनकी चौखट पर हर ग़रीब की झोली भरती है, इसलिए उस दर को छोड़कर कहीं और जाना व्यर्थ है।
लिरिक्स के पहले शेर के मुताबिक, अगर ख़ुदा दिल को अक़्ल (समझ) दे तो इंसान को किस की गली छोड़ कर नहीं जाना चाहिए?