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फासलों को तकल्लुफ है हमसे अगर Lyrics In हिन्दी

(फासलों को तकल्लुफ है हमसे अगर, हम भी बेबस नहीं, बेसहारा नहीं)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : फासलों को तकल्लुफ है हमसे अगर

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

जोड़ा गया : 09 Apr, 2023 10:18 AM IST

बार देखा गया : 185

Time to read: 2 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

फासलों को तकल्लुफ है हमसे अगर,
हम भी बेबस नहीं, बेसहारा नहीं।

खुद उन्हीं को पुकारेंगे हम दूर से,
रास्ते में अगर पैर थक जाएंगे।

हम मदीने में तन्हा निकल जाएंगे,
और गलियों में क़सदन भटक जाएंगे।

हम वहां जाकर वापस नहीं आएंगे,
ढूंढते ढूंढते लोग थक जाएंगे।

जैसे ही सिब्ज़ गुंबद नज़र आएगा,
बंदगी का करीना बदल जाएगा।

सिर झुकाने की फुर्सत मिलेगी किसे,
खुद ही पलकों से सज्दे टपक जाएंगे।

नाम-ए-आक़ा जहां भी लिया जाएगा,
ज़िक्र उनका जहां भी किया जाएगा।

नूर ही नूर सीने में भर जाएगा,
सारी महफ़िल में जलवे लपक जाएंगे।

ऐ मदीने के ज़ाहिर ख़ुदा के लिए,
दास्तान-ए-सफ़र मुझको यूँ मत सुना।

बात बढ़ जाएगी, दिल तड़प जाएगा,
मेरे मुहात आँसू छलक जाएंगे।

उनकी चश्म-ए-करम को है इसकी ख़बर,
किस मुसाफिर को है कितना शौक-ए-सफ़र।

हमको इक़बाल जब भी इजाज़त मिली,
हम भी आक़ा के दरबार तक जाएंगे।

फासलों को तकल्लुफ है हमसे अगर,
हम भी बेबस नहीं, बेसहारा नहीं।

खुद उन्हीं को पुकारेंगे हम दूर से,
रास्ते में अगर पैर थक जाएंगे।

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह नात शरीफ़ मदीना मुनव्वरा की हाज़िरी की तड़प और हुज़ूर ﷺ से एक आशिक की बेपनाह मोहब्बत का बयान है। इसमें बताया गया है कि चाहे मदीने की दूरियां कितनी ही ज़्यादा क्यों न हों, एक मोमिन कभी बेसहारा नहीं होता क्योंकि हमारे आक़ा हर उम्मती के दिल का हाल जानते हैं।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि अगर मदीने के फ़ासलों को हमसे कोई हिचकिचाहट या ऐतराज़ है, तो हम भी मजबूर नहीं हैं; हम दूर से ही अपने आक़ा ﷺ को पुकार लेंगे। शायर कहता है कि जैसे ही मदीने का 'सबज़ गुंबद' नज़र आएगा, इबादत का तरीक़ा ही बदल जाएगा—वहाँ अदब का यह आलम होगा कि सिर झुकाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि आँखों से बहने वाले आँसू ही सजदा बनकर टपक जाएंगे।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ (Meaning)
तकल्लुफहिचकिचाहट / औपचारिकता या रुकावट
क़सदनजान-बूझकर / इरादतन
सबज़ गुंबदहरा गुंबद (हुज़ूर ﷺ का रौज़ा मुबारक़)
करीनातरीक़ा / सलीक़ा या ढंग
ज़ाहिर (ज़ायर)मदीने की यात्रा/ज़ियारत करने वाला
मुहात (मोहतात)संभले हुए / एहतियात रखने वाले
चश्म-ए-करमकृपा दृष्टि / दया की नज़र
शौक-ए-सफ़रयात्रा की चाहत / मदीने जाने की लगन

सारांश (Summary)

इस कलाम में मदीने की गलियों में खो जाने और वहीं का होकर रह जाने की दिली ख़्वाहिश को दर्शाया गया है। शायर 'इक़बाल' कहते हैं कि आक़ा ﷺ का ज़िक्र महफ़िल में नूर भर देता है और जब कोई मदीने से लौटकर वहाँ की दास्तान सुनाता है, तो दिल तड़प उठता है। उन्हें पूरा यक़ीन है कि हुज़ूर ﷺ उनकी इस तड़प से वाक़िफ़ हैं और जैसे ही वहाँ से बुलावा (इजाज़त) आएगा, वे सारे फ़ासले मिटाकर उनके दरबार में हाज़िर हो जाएंगे।

शायर के मुताबिक सबज़ गुंबद देख कर क्या बदल जाएगा, और उन्होंने 'ज़ायर' से मदीने की दास्तान सुनाने से क्यों मना किया?

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