मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : दाग़-ए-फ़ुर्क़त-ए-तैबा क़ल्ब मुज़म्हिल जाता
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अख्तर रज़ा खान अज़हरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 05 Aug, 2023 10:41 AM IST
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दाग़-ए-फ़ुर्क़त-ए-तैबा क़ल्ब मुज़म्हिल जाता,
काश गुम्बद-ए-ख़ज़रा देखने को मिल जाता।
मेरा दम निकल जाता उनके आस्ताने पर,
उनके आस्ताने की ख़ाक में मिल जाता।
मेरे दिल से धुल जाता दाग़-ए-फ़ुर्क़त-ए-तैबा,
तैबा में फ़ना होकर तैबा में ही मिल जाता।
मौत ले के आ जाती ज़िन्दगी मदीने में,
मौत से गले मिल कर ज़िन्दगी में मिल जाता।
ख़ुल्द-ए-ज़ार-ए-तैबा का इस तरह सफ़र होता,
पीछे-पीछे सर जाता, आगे-आगे दिल जाता।
दिल पे जब किरन पड़ती उनके सब्ज़ गुम्बद की,
उसकी सब्ज़ रंगत से बाग़ बन के खिल जाता।
फ़ुर्क़त-ए-मदीना ने वो दिये मुझे सदमे,
कोह पर अगर पड़ते, कोह भी तो हिल जाता।
दिल पे वो क़दम रखते, नक़्श-ए-पा ये दिल बनता,
या तो ख़ाक-ए-पा बन कर पा से मुत्तसिल जाता।
उनके दर पे अख़्तर की हसरतें हुई पूरी,
साइल-ए-दर-ए-अक़दस कैसे मुनफ़इल जाता।
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यह दर्द भरी नात-ए-पाक मदीना शरीफ़ की जुदाई के गहरे ग़म और हुज़ूर ﷺ के आस्ताने पर हाज़िर होने की तड़प को दर्शाती है। इसमें शायर ने सबज़ गुम्बद (गुम्बद-ए-ख़ज़रा) को देखने और मदीने की पावन धरती पर अपने प्राण त्यागने की इच्छा व्यक्त की है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मदीना (तैबा) की जुदाई के दर्द से मेरा दिल बेहद कमज़ोर और बेजान सा हो गया है, काश मुझे एक बार सबज़ गुम्बद का दीदार नसीब हो जाता। शायर इच्छा करता है कि काश उसकी मृत्यु नबी ﷺ के चौखट पर आए और वह वहाँ की पवित्र धूल (ख़ाक) में हमेशा के लिए मिल जाए ताकि दिल के सारे दुख दूर हो सकें।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| फ़ुर्क़त-ए-तैबा | मदीना शरीफ़ की जुदाई का ग़म |
| क़ल्ब मुज़म्हिल | उदास, थका हुआ या मुरझाया हुआ दिल |
| आस्ताने | चौखट / ड्योढ़ी |
| फ़ना | नष्ट होना / मिट जाना |
| ख़ुल्द-ए-ज़ार | स्वर्ग का बाग़ |
| कोह | पर्वत / पहाड़ |
| मुत्तसिल | जुड़ा हुआ / लगा हुआ |
| मुनफ़इल | लज्जित / निराश या मायूस |
इस कलाम में मदीना शरीफ़ की जुदाई के सदमों को इतना भारी बताया गया है कि यदि ये किसी पहाड़ पर पड़ते तो वह भी काँप उठता। शायर 'अख़्तर' (ताजुश्शरिया हज़रत अख़्तर रज़ा ख़ान) कहते हैं कि नबी ﷺ के पवित्र दर पर पहुँचकर उनकी तमाम हसरतें पूरी हो गईं, क्योंकि उस पवित्र चौखट पर आया हुआ कोई भी याचक (साइल) कभी निराश या ख़ाली हाथ वापस नहीं लौटता।
शायर के मुताबिक मदीना (तैबा) की जुदाई का ग़म इतना ज़्यादा है कि अगर वो पहाड़ (कोह) पर पड़ता तो क्या होता?