मेरे सरकार गुलज़ार-ए-मिल्लत की क्या शान है
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टाइटल : चाँद अजमेर में कितना रौशन हुआ
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अल्लामा निसार अली उजागर
नातख्वान/कलाकार: अब्दुल्लाह खलील कादरी असद रज़ा अत्तारी फरहान अली कादरी फुरकान कादरी
जोड़ा गया : 03 Jan, 2024 09:24 AM IST
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ख़्वाजा! ख़्वाजा! ख़्वाजा! ख़्वाजा!
किश्त-ए-दीदा-ओ-जाँ लहलहाने लगी
मेरे दिल की ज़मीं मुस्कुराने लगी
इश्क़-ए-ख़्वाजा के पौधे शजर बन गए
धरती अजमेर की जगमगाने लगी
ख़्वाजा पिया! ख़्वाजा पिया!
ख़्वाजा पिया! ख़्वाजा!
चाँद अजमेर में कितना रौशन हुआ
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
कुफ़्र-ओ-ज़ुल्मत का बादल ख़ुद ही छट गया
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
चिश्तियों के घरों में ख़ुशी आ गई
ऐसा लगने लगा ज़िंदगी आ गई
चेहरा चेहरा खिला, दिल भी कहने लगा
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
आए दरबार में ले के कश्कोल हम
कर दो, कर दो करम, रख लो सब का भरम
तेरे दर से न मायूस कोई गया
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
हर जगह तेरी इज़्ज़त का शोहरा हुआ
लाडला तू नबी का, हसन संजरी!
इब्न-ए-ज़हरा है तू, हसनी शजरा तेरा
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
आज अजमेर क्या! सारी दुनिया में ही
ख़्वाजा-ए-चिश्त की महफ़िलें सज गईं
है उजागर समाँ, ख़ूब लंगर हुआ
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की छटी आ गई
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यह मनक़बत हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (रह.) की शान और उनके उर्स (छठी शरीफ़) की बरकतों का एक ख़ूबसूरत वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के प्रेम से भक्त के मन की बंजर ज़मीन हरी-भरी हो गई है और उनके उर्स (छठी) की आमद से अंधेरा छट गया है। शायर कहता है कि अजमेर का ज़र्रा-ज़र्रा उनके नूर से जगमगा रहा है और भक्त उनके दर पर अपनी झोली (कश्कोल) फैलाकर करम की भीख माँग रहे हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| किश्त-ए-दीदा-ओ-जाँ | आँखों और प्राणों की खेती |
| शजर | पेड़ या वृक्ष |
| ज़ुल्मत | अंधकार या अंधेरा |
| कश्कोल | भिक्षा पात्र या प्याला |
| इब्न-ए-ज़हरा | हज़रत फ़ातिमा (ज़हरा) के सुपुत्र |
| शजरा | वंशावली (Family Tree) |
| उजागर | प्रकाशित या साफ़ |
| शोहरा | प्रसिद्धि या चर्चा |
इस कलाम का सार यह है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (रह.) का दरबार वह स्थान है जहाँ से कोई भी निराश नहीं लौटता। उनकी 'छठी शरीफ़' का अवसर चिश्ती सिलसिले के मानने वालों के लिए नई ज़िंदगी और रूहानी ख़ुशी लेकर आता है। उन्हें "हसन संजरी" और नबी ﷺ का लाडला कहकर उनकी उच्च वंशावली और अजमेर में उनकी आध्यात्मिक सत्ता को सलाम पेश किया गया है।
ख्वाजा-ए-ख्वाजगान की "छठी" आने पर अजमेर और चिश्तियों के घरों का माहौल कैसा हो जाता है?