मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : चमक तुझसे पाते हैं सब पाने वाले
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Apr, 2023 09:27 AM IST
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चमक तुझसे पाते हैं सब पाने वाले
मेरा दिल भी चमका दे चमकाने वाले
बरसता नहीं देख कर अब्र-ए-रहमत
बदों पर भी बरसा दे बरसाने वाले
मैं मुजरिम हूँ आका मुझे साथ ले लो
कि रास्ते में हैं जा-ब-जा थाने वाले
हरम की ज़मीं और क़दम रख के चलना
अरे सर का मौक़ा है, ओ जाने वाले
मदीने के ख़ित्ते, ख़ुदा तुझको रखे
ग़रीबों फ़क़ीरों के ठहराने वाले
तु ज़िंदा है वल्लाह, तु ज़िंदा है वल्लाह
मेरी चश्म-ए-आलम से छुप जाने वाले
तेरा खाए, तेरे ग़ुलामों से उलझे
हैं मुनकिर अजब ख़ाने ग़ुर्राने वाले
चल उठ ज़बाह फ़रसा हो साक़ी के दर पर
दर-ए-जूद है मेरे मस्ताने वाले
रहेगा यूँ ही उनका चर्चा रहेगा
पड़े ख़ाक हो जाए जल जाने वाले
अब आई शफ़ाअत की साअत अब आई
ज़रा चैन ले मेरे घबराने वाले
रज़ा, नफ़्स दुश्मन है दम में ना आना
कहा तुमने देखे हैं चंद राने वाले
चमक तुझसे पाते हैं सब पाने वाले
मेरा दिल भी चमका दे चमकाने वाले
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यह सुप्रसिद्ध नात शरीफ़ इमाम-ए-अहले-सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी द्वारा रचित है। इसमें नबी-ए-करीम ﷺ की नूरानियत, उनके जीवित होने (हयात-उल-नबी), उनकी शफ़ाअत (क्षमा की सिफ़ारिश) और उनके दर की अज़मत को पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रस्तुत किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि इस संसार में जिसे भी ज्ञान, अध्यात्म और ईमान की चमक मिली है, वह सब हुज़ूर ﷺ के नूर से ही मिली है। शायर प्रार्थना करता है कि हे आक़ा! मैं गुनहगार ज़रूर हूँ, लेकिन आपकी रहमत का बादल (अब्र-ए-रहमत) अच्छे-बुरे का भेद किए बिना सब पर बरसता है, इसलिए मेरे काले दिल को भी अपने नूर से रोशन कर दीजिए और मुझे अपने साथ ले लीजिए क्योंकि परलोक के मार्ग में कर्मों की जवाबदेही के कई थाने (पड़ाव) हैं।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| बदों | बुरों / गुनहगारों |
| अब्र-ए-रहमत | दया का बादल / रहमत का बादल |
| जा-ब-जा | जगह-जगह / हर मोड़ पर |
| ख़ित्ते | क्षेत्र / पावन धरती (मदीना) |
| चश्म-ए-आलम | दुनिया की आँख / सांसारिक दृष्टि |
| मुनकिर | इनकार करने वाला / विरोधी |
| दर-ए-जूद | उदारता/दानशीलता का दरवाज़ा |
| साअत | घड़ी / समय या पल |
| शफ़ाअत | मोक्ष/क्षमा के लिए सिफ़ारिश |
| नफ़्स | आंतरिक बुराई / वासना या अहंकार |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि हुज़ूर ﷺ अपनी क़ब्र-ए-अन्वर में हक़ीक़त में जीवित (ज़िंदा) हैं, भले ही वे दुनिया की आँखों से ओझल हों। आला हज़रत कहते हैं कि विरोध करने वाले चाहे जलकर ख़ाक हो जाएँ, नबी ﷺ का ज़िक्र और चर्चा कयामत तक यूँ ही बुलंद रहेगा। जब कयामत के दिन पापी और गुनहगार अपनी भूलों के कारण घबरा रहे होंगे, तब आक़ा ﷺ की शफ़ाअत (सिफ़ारिश) की घड़ी आएगी जो हर तड़पते हुए मोमिन को चैन और मुक्ति दिलाएगी।
शायर ने 'जा बजा थाने वाले' शब्द से किस तरफ़ इशारा किया है, और उन्होंने नबी ﷺ के ज़िंदा होने पर क्या गवाही दी है?