मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : चाहते आप तो ख़ुद दौड़ के आता पानी
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : ज़ैनुल आबिदीन कानपुरी
नातख्वान/कलाकार: ज़ैनुल आबिदीन कानपुरी
जोड़ा गया : 15 Jul, 2024 10:11 AM IST
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चाहते आप तो ख़ुद दौड़ के आता पानी,
या हुसैन आप की ठोकर से निकलता पानी
क्या थी औक़ात पिला देता जो दरिया पानी,
मेरे अब्बास ने दरिया को पिलाया पानी
सब्र तो देखिए सरकार के घर वालों का,
एक बच्चे ने भी दुश्मन से न मांगा पानी
मान लेता जो याजीद इबन-ए-अली की अजमत,
फिर तो खुद भरता वो शब्बीर के घर का पानी
एड़ियाँ अपनी ज़मीं पर जो रगड़ते असग़र,
कर्बला तेरे सँभाले न सँभलता पानी
चाहते आप तो ख़ुद दौड़ के आता पानी,
या हुसैन ! आप की ठोकर से निकलता पानी
आसमाँ गर तुझे शब्बीर इशारा करते,
दिल ये कहता है कि दिन-रात बरसता पानी
या अली शेर-ए-ख़ुदा ! आप के बेटे शब्बीर,
हुक्म दे देते तो सूरज भी उगलता पानी
या हुसैन आप की ठोकर से निकलता पानी,
या हुसैन आप की ठोकर से निकलता पानी
इतने तर-दस्त थे अब्बास के दोनों बाज़ू,
पड़ गया जिस के भी उस ने ना माँगा पानी
तुझ पे सौ जान है क़ुर्बान मेरी, ऐ असग़र,
तेरी हिम्मत ने यज़ीदों को पिलाया पानी
कौन कहता है कि पानी के थे प्यासे शब्बीर
सच तो ये है कि था शब्बीर का प्यासा पानी
चाहते आप तो ख़ुद दौड़ के आता पानी,
या हुसैन आप की ठोकर से निकलता पानी
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यह मनकबत इमाम हुसैन (र.अ.) और उनके परिवार के उस अटूट धैर्य और आध्यात्मिक शक्ति का वर्णन करती है, जो उन्होंने कर्बला के मैदान में भीषण प्यास के बावजूद दिखाई थी।
शायर कहता है कि इमाम हुसैन (र.अ.) के पास वह रूहानी ताकत थी कि अगर वे चाहते तो ज़मीन से चश्मा जारी कर देते या आसमान को बरसने का हुक्म दे देते। मगर उन्होंने अल्लाह की मर्ज़ी के लिए प्यास और शहादत को चुना ताकि दुनिया को हक़ और सब्र का पाठ पढ़ाया जा सके।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| औक़ात (Auqaat) | हैसियत या सामर्थ्य |
| अज़मत (Azmat) | महानता या प्रतिष्ठा |
| तर-दस्त (Tar-Dast) | कुशल या शक्तिशाली हाथ वाले |
| शब्बीर (Shabbir) | इमाम हुसैन (र.अ.) का एक नाम |
| असग़र (Asgar) | इमाम हुसैन (र.अ.) के सबसे छोटे पुत्र |
| शेर-ए-ख़ुदा | अल्लाह का शेर (हज़रत अली र.अ. का लक़ब) |
इस कलाम का सार यह है कि कर्बला की प्यास मजबूरी नहीं, बल्कि एक चुनाव था। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने दुश्मन के सामने सिर झुकाने के बजाय प्यासा रहना पसंद किया। यह कविता दर्शाती है कि प्यास इमाम की प्यासी नहीं थी, बल्कि पानी खुद इमाम के होठों को छूने के लिए तरस रहा था।
मनक़बत के आखिर में शायर ने हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) की प्यास के बारे में क्या हकीकत बयान की है?