मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : बेदम शाह वारसी
नातख्वान/कलाकार: असद रज़ा अत्तारी दिलकश रज़ा सिवानी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 19 May, 2023 07:14 AM IST
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बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
इतना तो करम करना, ए चश्म-ए-करीमाना!
जब जान लबों पर हो, तुम सामने आ जाना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
क्यूँ आँख मिलाई थी, क्यूँ आग लगाई थी
अब रुख़ को छुपा बैठे कर के मुझे दीवाना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
जी चाहता है तोहफ़े में भेजूँ मैं उन्हें आँखें
दर्शन का तो दर्शन हो, नज़राने का नज़राना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
क्या लुत्फ़ हो महशर में! क़दमों में गिरूँ उन के
सरकार कहें देखो, दीवाना है दीवाना!
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
मैं होश-ओ-हवास अपने इस बात पे खो बैठा
जब तू ने कहा हँस के, आया मेरा दीवाना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
पीने को तो पी लूँगा, पर अर्ज़ ज़रा सी है
अजमेर का साक़ी हो, बग़दाद का मय-ख़ाना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
बेदम! मेरी क़िस्मत में चक्कर हैं इसी दर के
छूटा है न छूटेगा मुझ से दर-ए-जानाना
बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना
आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना!
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यह सूफियाना शायरी के बेताज बादशाह हज़रत बेदम शाह वारसी द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय और रूहानी ग़ज़ल (कलाम) है। इसमें कवि ने पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ और ईश्वर (ख़ुदा) के प्रति अपने इश्क़ की पराकाष्ठा, दीवानगी और रूहानी तड़प को बेहद मर्मस्पर्शी शब्दों में पिरोया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि प्रिय (आक़ा ﷺ) का हया और परदे का अंदाज़ भक्त को पूरी तरह मदहोश (बे-ख़ुद) कर देता है। कवि उनसे प्रार्थना करता है कि हे करुणा की दृष्टि रखने वाले (चश्म-ए-करीमाना), कम से कम इतना उपकार ज़रूर करना कि जब मेरी मृत्यु का समय आए और प्राण होठों पर हों (जान लबों पर हो), तो आप मेरे सामने तशरीफ़ ले आना।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| बे-ख़ुद | मदहोश / रूहानी मस्ती में लीन |
| अंदाज़-ए-हिजाबाना | परदे या हया का अंदाज़ |
| जल्वा-ए-जानाना | प्रिय (ईश्वर या नबी) का नूरानी स्वरूप |
| चश्म-ए-करीमाना | दयालु और कृपालु आँखें |
| महशर | प्रलय या कयामत का दिन |
| साक़ी / मय-ख़ाना | शराब पिलाने वाला / मदिरालय (सूफी संदर्भ में: गुरु और रूहानी स्थान) |
| दर-ए-जानाना | महबूब की चौखट |
इस सूफ़ियाना कलाम का मुख्य सार यह है कि एक सच्चे प्रेमी के लिए उसके प्रिय का दीदार (दर्शन) ही सबसे बड़ी जागीर है, इसलिए वह अपनी आँखें ही भेंट स्वरूप देने की बात करता है ताकि भेंट की भेंट हो जाए और दर्शन का दर्शन। वह कयामत (महशर) के दिन भी आक़ा के कदमों में गिरकर 'अपना दीवाना' कहलाने की तमन्ना रखता है। अंत में, कवि कहता है कि उसकी आध्यात्मिक प्यास तब बुझेगी जब अजमेर (ख़्वाजा ग़रीब नवाज़) का साक़ी हो और बग़दाद (ग़ौस-ए-आज़म) का मय-ख़ाना हो, और वह मरते दम तक इस पवित्र चौखट को छोड़ने को तैयार नहीं है।
लिरिक्स के मुताबिक, शायर अपने महबूब को तोहफ़े (उपहार) में क्या भेजना चाहता है?