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बाग़ जन्नत के हैं बहरे मदहा ख्वान अहल ए बैत Lyrics In हिन्दी

(बाग़ जन्नत के हैं बहरे मदहा ख्वान अहल-ए-बैत, तुम को मूज़्दा नार का, ऐ दुश्मनाने अहल-ए-बैत)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : बाग़ जन्नत के हैं बहरे मदहा ख्वान अहल-ए-बैत

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात

नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी

जोड़ा गया : 07 Aug, 2023 08:52 AM IST

बार देखा गया : 1.7K

Time to read: 5 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

बाग़ जन्नत के हैं बहरे मदहा ख्वान अहल-ए-बैत,
तुम को मूज़्दा नार का, ऐ दुश्मनाने अहल-ए-बैत।

उनके घर तो बेजाज़त जिब्रील आते नहीं,
कद्र वाले जानते हैं कद्र ओ शान-ए-अहल-ए-बैत।

उनकी पाकी का ख़ुदा-ए-पाक करता है बयान,
आया-ए-ततहीर से ज़ाहिर है शान-ए-अहल-ए-बैत।

घर लुटाना जान देना कोई तुझसे सीख जाए,
जान-ए-आलम हो फ़िदा ऐ ख़ानदान-ए-अहल-ए-बैत।

अहल-ए-बैत-ए-पाक से गुस्ताख़ियाँ बेबाक़ियाँ,
लानतुल्लाही अलैकुम दुश्मनाने अहल-ए-बैत।

बेअदब गुस्ताख़ फ़िर्क़े को सुना दे ऐ हसन,
यूँ कहा करते हैं आशिक़ दास्तान-ए-अहल-ए-बैत।

किस ज़बान से हो बयान इज़्ज़ ओ शान-ए-अहल-ए-बैत,
मदहगो-ए-मुस्तफ़ा हैं मदहा ख्वान-ए-अहल-ए-बैत।

मुस्तफ़ा इज़्ज़त बढ़ाने के लिए तअज़ीम दें,
है बुलंद इक़बाल तेरा दूधमांने अहल-ए-बैत।

अपना सौदा बेच कर बाज़ार सुना कर गए,
कौन सी बस्ती बसाई ताजिरान-ए-अहल-ए-बैत।

रम्ज़ का मैदान बना है जल्वागाह-ए-हुस्न ओ इश्क़,
कर्बला में हो रहा है इंतिहान-ए-अहल-ए-बैत।

फूल ज़ख्मों के खिलाए हैं हवा-ए-दोस्त ने,
ख़ून से सींचा गया है गुलसितान-ए-अहल-ए-बैत।

हूरें करती हैं अरूसाने-शहादत का सिंगार,
ख़ूब्रू दुल्हा बना है हर जवान-ए-अहल-ए-बैत।

जुम्मा का दिन है किताब-ए-ज़िंदगी की तय कर के आज,
खेलते हैं जान पर शहज़ादगान-ए-अहल-ए-बैत।

ऐ शबाब-ए-फस्ले गुल ये चल गई कैसी हवा,
कट रहा है लहलहाता बग़ीचा-ए-अहल-ए-बैत।

किस शकी की है हुकूमत हाए क्या अंधेर है,
दिन दहाड़े लुट रहा है क़ारवाँ-ए-अहल-ए-बैत।

ख़ुश्क हो जा ख़ाक हो कर ख़ाक में मिल जा फ़ुरात,
ख़ाक तुझ पर देख तो सूखी ज़बान-ए-अहल-ए-बैत।

ख़ाक पर अब्बास ओ उस्मान-ए-आलम बरदार हैं,
बे-कसी अब कौन उठाएगा निशान-ए-अहल-ए-बैत।

तेरी कुदरत जानवर तक आब से सेहराब हैं,
प्यास की शिद्दत में तड़पे बेज़बान-ए-अहल-ए-बैत।

काफ़िला सालार मंज़िल को चले हैं सौंप कर,
वारिस-ए-बेवारिसाँ को कारवाँ-ए-अहल-ए-बैत।

फ़ातिमा के लाडले का आख़िरी दीदार है,
हश्र का हंगामा बरपा है मयां-ए-अहल-ए-बैत।

वक़्त-ए-आख़िर कह रहा है ख़ाक में मिलता सुहाग,
लो सलाम-ए-आख़िरी ऐ देवगान-ए-अहल-ए-बैत।

किस मज़े की लज़्ज़तें हैं आब-ए-तैग़-ए-यार में,
ख़ाक ख़ून में लोटते हैं तिश्नगान-ए-अहल-ए-बैत।

बाग़-ए-जन्नत छोड़ कर आए हैं महबूब-ए-ख़ुदा,
ऐ ज़हे क़िस्मत तुम्हारी पुश्तगान-ए-अहल-ए-बैत।

हूरें बेपर्दा निकल आई हैं सर खोले हुए,
आज कैसा हश्र है बरपा मयां-ए-अहल-ए-बैत।

कोई क्यों पूछे किसी को क्या गरज़ ऐ बे-कसी,
आज कैसा है मरीज़-ए-नीम-जाँ-ए-अहल-ए-बैत।

घर लुटाना जान देना कोई तुझसे सीख ले,
जान-ए-आलम हो फ़िदा ऐ ख़ानदान-ए-अहल-ए-बैत।

सर-ए-शहीदाने-मुहब्बत के हैं नेज़ों पर बुलंद,
और ऊँची की ख़ुदा ने कद्र ओ शान-ए-अहल-ए-बैत।

दौलत-ए-दीदार पाई पाक जानें बेच कर,
कर्बला में खूब ही चमकी दुकान-ए-अहल-ए-बैत।

ज़ख़्म खाने को, आब-ए-तैग़ पीने को दिया,
ख़ूब दावत की बुला कर दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत।

हो गई तहक़ीक़ ईद-ए-दीद आब-ए-तैग़ से,
अपने रोज़े खोलते हैं साइमान-ए-अहल-ए-बैत।

बाग़ जन्नत के हैं बहरे मदहा ख्वान अहल-ए-बैत,
तुम को मूज़्दा नार का, ऐ दुश्मनाने अहल-ए-बैत।

उनके घर तो बेजाज़त जिब्रील आते नहीं,
कद्र वाले जानते हैं कद्र ओ शान-ए-अहल-ए-बैत।

मुस्तफ़ा इज़्ज़त बढ़ाने के लिए तअज़ीम दें,
है बुलंद इक़बाल तेरा दूधमांने अहल-ए-बैत।

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह मनकबत 'अहल-ए-बैत' (हुज़ूर ﷺ के पवित्र घराने) की सर्वोच्च महिमा, उनकी पवित्रता और कर्बला के मैदान में उनके द्वारा दी गई अद्वितीय कुर्बानियों का वर्णन करती है। इसमें नबी के घराने से प्रेम करने वालों के लिए जन्नत की बहारों और उनसे शत्रुता रखने वालों के लिए कड़े न्याय का ज़िक्र है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि अहल-ए-बैत की पाकीज़गी की गवाही स्वयं ईश्वर ने क़ुरान की 'आयत-ए-ततहीर' में दी है, और यह वह घराना है जहाँ हज़रत जिब्रील भी बिना अनुमति के प्रवेश नहीं करते। शायर कहता है कि कर्बला के तपते मैदान में इस पाक घराने ने प्यास और ज़ुल्म को सहकर भी सत्य (धर्म) की रक्षा की और अपने प्राणों की आहुति देकर इस्लाम के चमन को हमेशा के लिए अमर कर दिया।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्द (Word)अर्थ (Meaning)
मदहा ख्वानप्रशंसा करने वाला / तारीफ़ करने वाला
मूज़्दाशुभ समाचार / खुशखबरी (यहाँ व्यंग्य के रूप में दुश्मनों के लिए है)
नारआग / नरक की आग
आया-ए-ततहीरपवित्रता की आयत (अहल-ए-बैत की पाकीज़गी से संबंधित क़ुरान की आयत)
दूधमांनेवंश / कुल / घराना
शकीअत्यंत क्रूर / पापी / जालिम
फ़ुरातकर्बला की नदी का नाम
साइमानरोज़ा रखने वाले / व्रत रखने वाले

सारांश (Summary)

इस कलाम में कर्बला के उन महान शहीदों की शहादत का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है, जिन्होंने सत्य की राह पर अपना पूरा परिवार और घर-बार लुटा दिया। शायर 'हसन' (हसन रज़ा खान) कहते हैं कि अत्याचारियों ने भले ही शहीदों के सिरों को नेज़ों (भाला) पर बुलंद किया, लेकिन वास्तव में ईश्वर ने इसके ज़रिए अहल-ए-बैत के सम्मान और रुतबे को और ऊँचा कर दिया। जो इस पवित्र घराने का विरोधी है, वह दोनों जहान में घाटे में है।

शायर ने अहले-बैत के घराने की अज़मत बताने के लिए हज़रत जिब्रील और क़ुरान-ए-पाक की किस आयत का हवाला (संदर्भ) दिया है?

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