मतलबी ये दुनिया है मतलबी ज़माना है
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टाइटल : अर्श की अक़्ल दंग है चर्ख में आसमान है
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी ओवैस रज़ा कादरी ज़ोहैब अशरफ़ी
जोड़ा गया : 11 Sep, 2025 05:38 PM IST
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अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है,
जाने मुराद अब किधर, हाय! तेरा मकान है।
अर्श पे ताज़ा छेड़-छाड़,
फ़र्श पे तुर्फ़ा धूम-धाम,
कान जिधर लगाइए,
तेरी ही दास्तान है।
अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है।
वो जो न थे तो कुछ न था,
वो जो न हों तो कुछ न हो,
जान है वो जहान की,
जान है तो जहान है।
अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है।
पेशे नज़र वो नौ-बहार,
सज्दे को दिल है बेक़रार,
रोकिए सर को रोकिए,
हाँ! यहीं इम्तेहान है।
अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है।
तुझसा सियाह-कार कौन,
और उनस सफ़ीर है कहाँ,
फिर वो तुझी को ढूँढ़ता,
दिल ये तेरा गुमान है।
अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है।
शान-ए-ख़ुदा न साथ दे,
जिसके ख़िराम का वो बाज़,
सिदरा से ता ज़मीन जिसे,
हल्की सी एक उड़ान है।
अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है।
अर्श पे जा के मर्ग-ए-अक़्ल,
थक के गिरा, गश आगया,
और अभी मंज़िलों परे,
पहला ही आस्तान है।
अर्श की अक़्ल दंग है, चर्ख में आसमान है।
ख़ौफ़ न रख रज़ा ज़रा,
तू तो है अब्द-ए-मुस्तफ़ा,
तेरे लिए अमान है,
तेरे लिए अमान है।
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह कलाम आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी द्वारा रचित है, जिसमें हुज़ूर ﷺ की अज़मत और मे'राज (आसमानी यात्रा) का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि नबी ﷺ ही इस पूरी सृष्टि का आधार और कारण हैं।
कवि कहता है कि नबी ﷺ की महानता देख कर अर्श (आसमान) की बुद्धि भी हैरान है। पूरी कायनात उन्हीं के दम से आबाद है—अगर वे न होते तो कुछ भी न होता। उनकी शान यह है कि ज़मीन से लेकर सिदरा (अंतिम सीमा) तक की दूरी उनके लिए महज़ एक हल्की सी उड़ान है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| चर्ख | आकाश या ब्रह्मांड |
| तुर्फ़ा | अद्भुत या अनोखा |
| नौ-बहार | नई वसंत (प्रियतम के लिए संबोधन) |
| सियाह-कार | पापी या गुनहगार |
| सफ़़ीर | सिफारिश करने वाला / मध्यस्थ |
| ख़िराम | चलने का अंदाज़ या चाल |
| गश | बेहोशी |
| अमान | शरण या सुरक्षा |
इस नात का सारांश यह है कि हज़रत मोहम्मद ﷺ इस संसार की आत्मा हैं। अर्श और फ़र्श पर हर तरफ उन्हीं का चर्चा है। कवि खुद को तसल्ली देता है कि भले ही वह गुनहगार है, लेकिन चूँकि वह 'मुस्तफ़ा का बंदा' है, इसलिए उसे किसी बात का डर नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसे नबी ﷺ की पनाह और सुरक्षा प्राप्त है।
"जान है वो जहान की, जान है तो जहान है" — क्या यह पंक्ति आपके हृदय में ईश्वर के प्रेम की लौ नहीं जलाती?