मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : अगर मैं अहद-ए-रिसालत-मआब में होता
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : खालिद अब्बास अल-असदी
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 03 Feb, 2026 09:21 AM IST
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अगर मैं अहद-ए-रिसालत-मआब में होता,
ज़रूर हल्क़ा-ए-आली जनाब ﷺ में होता
जो मेरी सोच महकती सना के फूलों से,
तो हर अमल मेरा शामिल सवाब में होता
मेरे सवाल की लकनत पे मुस्कराते हुज़ूर ﷺ,
करम का बहता समंदर जवाब में होता
अगर इनाअत-ए-दीन के लिए बुलाते हुज़ूर ﷺ,
तो मेरा हाथ भी दस्त-ए-जनाब ﷺ में होता
मैं एक-एक सदा पर लिपटता क़दमों से,
जो मेरा नाम भी शामिल ख़िताब में होता
मैं आँख खोल के फिर ख़्वाब की दुआ करता,
मेरा नसीब जो बेदार ख़्वाब में होता
मैं जान अपनी निसार हुज़ूर ﷺ पर करता,
मेरा भी ज़िक्र शहीदों के बाब में होता
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यह नात एक आशिक-ए-रसूल की उस गहरी तमन्ना का बयान है जिसमें वह हुज़ूर ﷺ के ज़माने (दौर-ए-नबूवत) में मौजूद होने की आरज़ू करता है। यह कलाम उस दौर की सोहबत और कुर्बान होने के जज्बे को बड़ी खूबसूरती से पेश करता है।
कवि कल्पना करता है कि काश! वह हुज़ूर ﷺ के मुबारक ज़माने में होता और उनकी महफ़िल का हिस्सा बनता। वह चाहता है कि जब वह हकलाते हुए कोई सवाल करता, तो हुज़ूर ﷺ अपनी मुस्कुराहट से उसे नवाज़ते, और इस्लाम की सेवा के लिए उसका हाथ भी नबी ﷺ के हाथों में होता।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अहद-ए-रिसालत | पैग़म्बरी का काल (नबी ﷺ का ज़माना) |
| हल्क़ा | घेरा या सभा (Circle/Gathering) |
| सना | प्रशंसा या स्तुति (Praise) |
| लकनत | बोलने में हकलाहट (Stammering) |
| इनाअत-ए-दीन | धर्म की सहायता या रक्षा |
| दस्त-ए-जनाब | हुज़ूर ﷺ का मुबारक हाथ |
| बेदार ख़्वाब | जागती आँखों से देखा गया सपना |
| बाब | अध्याय या श्रेणी (Chapter/Category) |
इस कलाम का सारांश यह है कि कवि नबी ﷺ की प्रत्यक्ष सोहबत पाने के लिए तड़प रहा है। वह अपनी जान नबी ﷺ पर न्योछावर करके अपना नाम शहीदों की सूची में शामिल कराना चाहता है और उसकी सबसे बड़ी हसरत यह है कि उसे एक बार हुज़ूर ﷺ का सानिध्य मिल जाए, चाहे वह जागते हुए हो या किसी सच्चे सपने में।
नात के आखिरी मिसरों (पंक्तियों) के अनुसार, शायर "बेदार ख़्वाब" (जागती आँखों से ख़्वाब) देखने के बाद क्या दुआ माँगना चाहता है, और उसकी आखिरी ख्वाहिश क्या है?