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अगर मैं अहद ए रिसालत मआब में होता Lyrics In हिन्दी

(अगर मैं अहद-ए-रिसालत-मआब में होता, ज़रूर हल्क़ा-ए-आली जनाब ﷺ में होता)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : अगर मैं अहद-ए-रिसालत-मआब में होता

श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : खालिद अब्बास अल-असदी

नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात

जोड़ा गया : 03 Feb, 2026 09:21 AM IST

बार देखा गया : 80

Time to read: 1 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

अगर मैं अहद-ए-रिसालत-मआब में होता,
ज़रूर हल्क़ा-ए-आली जनाब ﷺ में होता

जो मेरी सोच महकती सना के फूलों से,
तो हर अमल मेरा शामिल सवाब में होता

मेरे सवाल की लकनत पे मुस्कराते हुज़ूर ﷺ,
करम का बहता समंदर जवाब में होता

अगर इनाअत-ए-दीन के लिए बुलाते हुज़ूर ﷺ,
तो मेरा हाथ भी दस्त-ए-जनाब ﷺ में होता

मैं एक-एक सदा पर लिपटता क़दमों से,
जो मेरा नाम भी शामिल ख़िताब में होता

मैं आँख खोल के फिर ख़्वाब की दुआ करता,
मेरा नसीब जो बेदार ख़्वाब में होता

मैं जान अपनी निसार हुज़ूर ﷺ पर करता,
मेरा भी ज़िक्र शहीदों के बाब में होता

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

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यह नात एक आशिक-ए-रसूल की उस गहरी तमन्ना का बयान है जिसमें वह हुज़ूर ﷺ के ज़माने (दौर-ए-नबूवत) में मौजूद होने की आरज़ू करता है। यह कलाम उस दौर की सोहबत और कुर्बान होने के जज्बे को बड़ी खूबसूरती से पेश करता है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

कवि कल्पना करता है कि काश! वह हुज़ूर ﷺ के मुबारक ज़माने में होता और उनकी महफ़िल का हिस्सा बनता। वह चाहता है कि जब वह हकलाते हुए कोई सवाल करता, तो हुज़ूर ﷺ अपनी मुस्कुराहट से उसे नवाज़ते, और इस्लाम की सेवा के लिए उसका हाथ भी नबी ﷺ के हाथों में होता।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
अहद-ए-रिसालतपैग़म्बरी का काल (नबी ﷺ का ज़माना)
हल्क़ाघेरा या सभा (Circle/Gathering)
सनाप्रशंसा या स्तुति (Praise)
लकनतबोलने में हकलाहट (Stammering)
इनाअत-ए-दीनधर्म की सहायता या रक्षा
दस्त-ए-जनाबहुज़ूर ﷺ का मुबारक हाथ
बेदार ख़्वाबजागती आँखों से देखा गया सपना
बाबअध्याय या श्रेणी (Chapter/Category)

सारांश (Summary)

इस कलाम का सारांश यह है कि कवि नबी ﷺ की प्रत्यक्ष सोहबत पाने के लिए तड़प रहा है। वह अपनी जान नबी ﷺ पर न्योछावर करके अपना नाम शहीदों की सूची में शामिल कराना चाहता है और उसकी सबसे बड़ी हसरत यह है कि उसे एक बार हुज़ूर ﷺ का सानिध्य मिल जाए, चाहे वह जागते हुए हो या किसी सच्चे सपने में।

नात के आखिरी मिसरों (पंक्तियों) के अनुसार, शायर "बेदार ख़्वाब" (जागती आँखों से ख़्वाब) देखने के बाद क्या दुआ माँगना चाहता है, और उसकी आखिरी ख्वाहिश क्या है?

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