मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ज़िक्र-ए-अहमद से सीना सजा है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शादाब ओ पैकर
नातख्वान/कलाकार: शादाब ओ पैकर
जोड़ा गया : 09 Sep, 2025 09:25 AM IST
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ज़िक्र-ए-अहमद से सीना सजा है,
इश्क़ है ये तमाशा नहीं है,
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
ला-मकाँ तक है तेरी रसाई,
गीत गाती है सारी खुदाई,
वो जगह ही नहीं दो जहाँ में,
जिस जगह तेरा चर्चा नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
शिद्दत-ए-ग़म से जलता है सीना,
अब तो हिंद में मुश्किल है जीना,
जल्दी आका बुला लो मदीना,
ज़िंदगी का भरोसा नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
हज की दौलत जिसे मिल न पाए,
जाए, जाए वो घर अपने जाए,
माँ के क़दमों को वो चूम ले जो,
सांग-ए-अस्वद को चूमा नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
चाँद, सूरज, सितारों को देखा,
ख़ुल्द मंज़र, नज़ारों को देखा,
लौट आई मगर मेरी नज़रें,
कोई भी तेरे जैसा नहीं।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
आए मेरी मौत, रुक जा अभी तू,
फिर चलेंगे जहाँ तू कहेगी,
अपनी मश्क़-ए-तसव्वुर में तैबा,
मैंने जी भर के देखा नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
ख़ाक-ए-पाए नबी मुँह पे मल लूँ,
इत्र हो मुस्तफ़ा का पसीना,
उनकी चादर का टुकड़ा कफ़न हो,
और कोई तमन्ना नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
हम हुसैनी हैं, कर्बल के शैदा,
दिल कभी भी न होता है मैला,
कुफ़्र की धमकियों से डरे जो,
सुन्नियों का कलेजा नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
दुश्मन-ए-आला हज़रत से कह दो,
ख़ैर चाहे तो हमसे न उलझे,
हम गुलामान-ए-अख़्तर रज़ा हैं,
कोई भी हमसे जीता नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
काश हम भी मदीने को जाते,
हाल-ए-दिल उनको रो कर सुनाते,
मुफ़लिसी से है मजबूर जामी,
वरना किस में ये जज़्बा नहीं है।
वो भी दिल कोई दिल है जहाँ में,
जिसमें तस्वीर-ए-तैबा नहीं है।
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यह कलाम हुज़ूर ﷺ की मुहब्बत और मदीना जाने की तड़प का एक खूबसूरत इज़हार है। इसमें बताया गया है कि एक सच्चे मोमिन की पहचान उसके दिल में बसी मदीने की याद (तस्वीर-ए-तैबा) है।
कवि कहता है कि वह हृदय वास्तव में हृदय कहलाने के योग्य नहीं है जिसमें मदीना की याद न हो। नबी ﷺ की पहुँच 'ला-मकाँ' (जहाँ स्थान और समय न हो) तक है और पूरे ब्रह्मांड में ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ उनका गुणगान न होता हो।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तस्वीर-ए-तैबा | मदीना की याद या छवि |
| ला-मकाँ | सीमाओं से परे (ईश्वर का स्थान) |
| रसाई | पहुँच (Access) |
| शिद्दत-ए-ग़म | दुःख की अधिकता |
| मश्क़-ए-तसव्वुर | कल्पना का अभ्यास / ध्यान लगाना |
| ख़ाक-ए-पा | पैरों की धूल |
| मुफ़लिसी | ग़रीबी या निर्धनता |
| शैदा | दीवाना या प्रेमी |
इस नात का सार यह है कि संसार की हर सुंदर वस्तु देखने के बाद भी आँखें हुज़ूर ﷺ के सौंदर्य पर ही ठहरती हैं। कवि अपनी निर्धनता के कारण मदीना न जा पाने का दुःख व्यक्त करता है, लेकिन साथ ही यह भी कहता है कि जो हज पर नहीं जा सकते, उनके लिए माँ के पैर चूमना ही 'हज्रे अस्वद' को चूमने जैसा पुण्य है।
माँ के चरणों की सेवा को हज के समान बताना—क्या यह विचार आपके दिल को नहीं छू गया?