मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हुजूर मुफ्ती आज़म ए हिंद मुस्तफा रज़ा खान नूरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 08 Apr, 2023 09:23 AM IST
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ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
ये कौन से शाहे बाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
सरकार की आमद मर्हबा
दिलदार की आमद मर्हबा
हुज़ूर की आमद मर्हबा
पूरनूर की आमद मर्हबा
सब मिल कर बोलो मर्हबा
ये आज तारे ज़मीं की तरफ़ हैं क्यों माएल
ये आसमां से पैहम है नूर क्यों नाज़िल
ये आज क्या है ज़माने ने रंग बदला है
ये आज क्या है कि आलम का ढंग बदला है
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
ये आज किस की शादी है अर्श क्यों झूमा
लब-ए-ज़मीं को लब-ए-आसमां ने क्यों चूमा
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
रसूल उन्हीं का तो मोज़्दा सुनाने आए हैं
उन्हीं के आने की खुशियाँ मनाने आए हैं
फ़रिश्ते आज जो धूमें मचाने आए हैं
उन्हीं के आने की शादी रचाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
ये भूले-बिछड़े को रास्ते पे लाने आए हैं
ये भूले-भटके को हादी बनाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
ख़ुदा-ए-पाक के जलवे दिखाने आए हैं
दिलों को नूर के बुग़चे बनाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
चमक से अपनी जहान जगमगाने आए हैं
महक से अपनी ये कूचे बसाने आए हैं
ये सीधा रास्ता हक़ का बताने आए हैं
ये हक़ के बंदों को हक़ से मिलाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
नसीम-ए-फैज़ से गुंचे खिलाने आए हैं
करम की अपनी बहारें दिखाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
यही तो सोते हुओं को जगाने आए हैं
यही तो रोते हुओं को हँसाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
हज़ार साल की रोशनशुदा बुझी आतिश
ये कुफ़्र-ओ-शिर्क की आतिश बुझाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
इन्हें ख़ुदा ने किया अपने मुल्क का मालिक
इन्हीं के क़ब्ज़े में रब के ख़ज़ाने आए हैं
जो चाहेंगे, जिसे चाहेंगे, ये उसे देंगे
करीम हैं ये, ख़ज़ाने लुटाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
जो गिर रहे थे उन्हें नसीबों ने थाम लिया
जो गिर चुके हैं, ये उनको उठाने आए हैं
रऊफ़ ऐसे हैं और ये रहीम हैं इतने
कि गिरते-पड़ते को सीने लगाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
सब रसूल ने कहा "इज़्हबू इला ग़ैरी"
"अनालहा" का ये मोज़्दा सुनाने आए हैं
अजब करम कि ख़ुद मुजरिमों के हामी हैं
गुनाहगारों की ये बख़्शिश कराने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
सुनोगे "ला" ना ज़बान-ए-करीम से नूरी
ये फ़ैज़-ओ-जूद के दरिया बहाने आए हैं
नसीब तेरा चमक उठा, देख तो नूरी
अरब के चाँद लहद के सिरहाने आए हैं
ये किस शहन-शाहे-वाला की आमद आमद है
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
बोलो मर्हबा, बोलो मर्हबा
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यह प्रसिद्ध नात शरीफ़ ईद-ए-मिलादुन्नबी के पावन अवसर पर हुज़ूर ﷺ के इस संसार में आगमन (विलादत) का एक अत्यंत उत्साहपूर्ण और अक़ीदत से भरा वर्णन है। इसमें आक़ा ﷺ के आने से धरती और आकाश में फैली खुशियों तथा इंसानी सभ्यता पर उनके उपकारों को दर्शाया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि यह दोनों जहान के सबसे महान सम्राट (हुज़ूर ﷺ) के आगमन का समय है, जिनका स्वागत पूरी कायनात को झूमकर 'मर्हबा' कहकर करना चाहिए। शायर कहता है कि उनके आने से आकाश से लगातार (पैहम) नूर की वर्षा हो रही है, अधर्म (कुफ़्र) की हज़ार साल से जलती आग बुझ गई है और वे ईश्वर के अनमोल आध्यात्मिक ख़ज़ाने लुटाने तथा भटके हुओं को सीधा मार्ग दिखाने तशरीफ़ लाए हैं।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| शहन-शाहे-वाला | उच्च पदवी वाले राजाओं के राजा (हुज़ूर ﷺ) |
| आमद आमद | आगमन / आने का समय |
| माएल (मायल) | झुका हुआ / प्रवृत्त |
| पैहम | लगातार / निरंतर |
| नाज़िल | अवतरित होना / उतरना |
| मोज़्दा | खुशखबरी / शुभ समाचार |
| हादी | मार्गदर्शक / सच्चा रास्ता दिखाने वाला |
| बुग़चे | पोटली / गुलदस्ता (यहाँ आशय दिलों के खिलने से है) |
| नसीम-ए-फैज़ | कृपा की शीतल हवा |
| हामी | मददगार / पक्ष लेने वाला या रक्षक |
| लहद | क़ब्र / समाधि |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि ईश्वर ने अपने महबूब ﷺ को पूरी सृष्टि की रहमत और ख़ज़ानों का स्वामी बनाकर भेजा है, जो निराश मानवता को हँसाने और सोए हुओं को जगाने आए हैं। महाप्रलय (कयामत) के दिन जब अन्य सभी पैग़म्बर अपनी लाचारी जताते हुए "इज़्हबू इला ग़ैरी" (मेरे अलावा किसी और के पास जाओ) कहेंगे, तब केवल मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ही "अनालहा" (मैं हूँ शफ़ाअत के लिए) का मुक्तिदायी नारा बुलंद करेंगे। शायर 'नूरी' कहते हैं कि आक़ा ﷺ की उदारता ऐसी है कि वे क़ब्र (लहद) के अंधेरे में भी अपने आशिक़ों के सिरहाने आकर उनके दुखों को दूर करते हैं।
कयामत और क़ब्र के हवाले से, शायर 'नूरी' ने नबी ﷺ के 'अना लहा' कहने और 'लहद के सिरहाने' आने का क्या मतलब बयान किया है?