मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : या रसूलुल्लाहया नबीयल्लाह या हबीबल्लाह
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : दानिश दावर (दानिश एफ डार और दावर फारूक)
नातख्वान/कलाकार: दानिश दावर (दानिश एफ डार और दावर फारूक)
जोड़ा गया : 18 Apr, 2023 09:26 PM IST
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या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
दो जहाँ के ताजदार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
महबूब-ए-परवरदिगार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
वो जो न थे तो कुछ न था, वो जो न हों तो कुछ न हो,
जान हैं वो जहान की, जान है तो जहान है
या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
दो जहाँ के ताजदार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
महबूब-ए-परवरदिगार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
आप की हर अदा पे है आलम फ़िदा,
बलग़ल-उला बि-कमालिहि,
ना हो ख़ुदा आप, ना हो ख़ुदा से जुदा,
कशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि
हर वक़्त मैं याद में तेरी रहूँ,
हसुनत जमी-उ-ख़िसालिहि,
हर पल ज़बाँ से ये विर्द करूँ,
सल्लू अलैहि व आलिहि
दिल में इश्क़-ए-मुहम्मद नहीं है अगर,
कलमा सुनने सुनाने से क्या फ़ाइदा,
क़ल्ब में शौक़-ए-तयबा नहीं है अगर,
मक्के में आने जाने से क्या फ़ाइदा
अर्श पे ताज़ा छेड़-छाड़, फ़र्श पे तुर्फ़ा धूम-धाम,
कान जिधर लगाइए तेरी ही दास्तान है,
या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
दो जहाँ के ताजदार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
आप का ग़म-ए-उम्मत में रोना,
सारी उम्मत की क़िस्मत को खोल गया,
आप ही की ज़ुबान से अल्लाह,
दीन-ए-हक़ सारे आलम में बोल गया
ज़िक्र-ए-उम्मत मुलाकात-ए-रब में भी था,
मेरी उम्मत, बस उम्मत ही उम्मत कहा,
इस मोहब्बत का हक़ ना अदा कर सके,
सब किया तूने, हम कुछ भी ना कर सके
ख़ुश्क सज्दे किये, ख़ूब माथा घिसा,
और पेशानी पे दाग़-ए-सज्दा पड़ा,
क़ल्ब दाग़-ए-मोहब्बत से ख़ाली रहा,
ऐसे माथा घिसाने से क्या फ़ाइदा
अल्लाहु रब्बु मुहम्मदिन सल्ला अलैहि व सल्लमा,
नह्नु इबादु मुहम्मदिन सल्ला अलैहि व सल्लमा
या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
दो जहाँ के ताजदार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
या नबीयल्लाह! या हबीबल्लाह!
महबूब-ए-परवरदिगार हैं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
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यह नबी करीम ﷺ की अज़मत और उनके प्रति अगाध प्रेम (इश्क़-ए-रसूल) में डूबा हुआ एक बेहद रूहानी और भावुक नातिया कलाम है, जो इंसान को दिखावे की इबादत छोड़कर दिल में सच्चा प्रेम जगाने की प्रेरणा देता है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ दोनों जहान के सुल्तान (ताजदार) और स्वयं ईश्वर (परवरदिगार) के सबसे प्रिय महबूब हैं। यदि उनका अस्तित्व न होता तो यह सृष्टि ही न होती, क्योंकि वे पूरे ब्रह्मांड की आत्मा हैं। कवि का मानना है कि ईश्वर से उनकी निकटता ऐसी है कि वे न तो स्वयं भगवान हैं और न ही भगवान से अलग हैं।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| ताजदार / परवरदिगार | राजा या शासक / ईश्वर या पालनहार |
| आलम / फ़िदा | संसार या ब्रह्मांड / न्योछावर या मोहित होना |
| कशफ़-द्दुजा | (उनके सौंदर्य ने) अंधेरे को दूर कर दिया |
| क़ल्ब / शौक़-ए-तयबा | हृदय या दिल / मदीना जाने की चाहत |
| विर्द | बार-बार जपना या सुमिरन करना |
| तुर्फ़ा धूम-धाम | अनोखी रौनक या अनोखा उत्सव |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि इस्लाम में केवल दिखावे के सजदे करने, माथे पर गट्टा (निशान) डालने या बिना प्रेम के मक्का जाने का कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं है, जब तक कि दिल में पैग़ंबर ﷺ के प्रति सच्चा इश्क़ न हो। आक़ा ﷺ ने मेराज की रात ईश्वर से मुलाक़ात के समय भी अपनी गुनहगार उम्मत (अनुयायियों) को याद किया और उनके आँसुओं ने ही हमारी क़िस्मत बदली है। अंत में, कवि स्वीकार करता है कि हम नबी के उपकारों का ऋण कभी नहीं चुका सकते, इसलिए हमारा हर पल केवल उन पर दरूद (सल्लू अलैहि व आलिहि) भेजने में बीतना चाहिए।
लिरिक्स के मुताबिक, अगर दिल में किसका इश्क़ न हो, तो कलमा सुनने और सुनाने से क्या फ़ायदा?