मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
- 1 दिन पहले fiber_manual_record 66 बार देखा गया
टाइटल : वो शहरे मोहब्बत जहां मुस्तफा है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: शाहिद रज़ा अशरफ़ी
जोड़ा गया : 09 Feb, 2023 12:36 PM IST
बार देखा गया : 18.6K
Time to read: 1 min read
वो शहरे मोहब्बत जहां मुस्तफा है
वही घर बनाने को जी चाहता है
वो सोने के कंकर वो सोने की मिट्टी
नज़र में बसाने को दिल चाहता है
जो पूछा नबी ने के कुछ घर भी छोड़ा
तो सिद्दिके अकबर के होंटों पे आया
वह मालों दौलत की क्या है हकीकत
जहां जान लूटाने को दिल चाहता है
वो नन्हा सा असगर वो एडी रगड़ कर
यही कह रहा है वो खेमे मे रोकर
ऐ बाबा मैं पानी का प्यासा नहीं हूँ
मेरा सर कटाने को दिल चाहता है
सितारों से यह चंद कहता है हर दम
तुम्हें क्या बताये वो टुकड़ों का आलम
इशारे में आका के इतना मज़ा था
के फिर टूट जाने को दिल चाहता है
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह नात-ए-पाक और मनक़बत का एक बेहद ख़ूबसूरत संगम है, जिसमें मदीना शरीफ़ की पावन धरती के प्रति अगाध प्रेम, ग़ज़वा-ए-तबूकर में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ का सर्वोच्च त्याग, कर्बला के मासूम हज़रत अली असग़र की शहादत का जज़्बा और नबी ﷺ के महान मोज़िज़े (चमत्कार) का वर्णन किया गया है।
इन रूहानी पंक्तियों का अर्थ है कि "मेरा दिल उस प्रेम की नगरी (मदीना मुनव्वरा) में अपना परमानेंट आशियाना बनाने को तड़प रहा है जहाँ हमारे आक़ा मुस्तफ़ा ﷺ आराम फ़रमा रहे हैं, और वहाँ की सोने जैसी पावन मिट्टी और कंकड़ों को आँखों का सूरमा बनाने का जी चाहता है।" शायर कहता है कि जहाँ रसूल की मोहब्बत में अपनी जान तक न्योछावर करने का जज़्बा हो, वहाँ धन-दौलत की कोई बिसात या अहमियत नहीं रह जाती।
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| शहरे मोहब्बत | प्रेम की नगरी (मदीना शरीफ़) |
| कंकर | छोटे-छोटे पत्थर |
| सिद्दिके अकबर | हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा) |
| हकीकत | असलियत या मूल्य (अहमियत) |
| असग़र / खेमे | हज़रत अली असग़र (६ महीने के मासूम) / तंबू (शिविर) |
| आलम | दशा, नज़ारा या स्थिति |
| मोज़िज़ा | चमत्कार (ईश्वरीय शक्ति से होने वाला कार्य) |
इस मुक़द्दस कलाम का मूल सार यह है कि सच्चे मोमिन के लिए नबी ﷺ का इश्क़ ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है, जैसा कि हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ ने घर का सारा सामान अल्लाह और उसके रसूल की राह में लुटाकर साबित किया था। नात में कर्बला का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि ६ महीने के मासूम अली असग़र प्यास से तड़पते हुए भी अपनी एड़ियाँ रगड़कर दीन पर सर कटाने का हौसला रखते हैं। अंत में हुज़ूर ﷺ के 'शक्कुल क़मर' (चाँद के दो टुकड़े करने के) मोज़िज़े का ज़िक्र करते हुए चाँद कहता है कि आक़ा के उँगली के इशारे में ऐसा रूहानी आनंद था कि मेरा दिल फिर से टूटकर बिखर जाने को चाहता है।
लिरिक्स के आखिरी हिस्से के मुताबिक, चांद ने सितारों से नबी ﷺ के किस मोज़िज़े (चमत्कार) का ज़िक्र किया है?