मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : उठा दो पर्दा, दिखा दो चेहरा कि नूरे-बारी हिज़ाब में है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Aug, 2023 02:19 PM IST
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उठा दो पर्दा, दिखा दो चेहरा कि नूरे-बारी हिज़ाब में है,
ज़माना तारीक हो रहा है कि मेहर कब से नक़ाब में है
नहीं वो मीठी निगाह वाला, ख़ुदा की रहमत है जल्वा फ़रमा,
ग़ज़ब से उनके ख़ुदा बचाए, जलाल-ए-बारी इताब में है
जली-जली बू से उसकी पैदा है सोज़िश-ए-इश्क़ चश्मे-वाला,
क़बाबे आहू में भी न पाया मज़ा जो दिल के कबाब में है
उन्हीं की बू माया-ए-सामान है, उन्हीं का जल्वा चमन-चमन है,
उन्हीं से गुलशन महक रहे हैं, उन्हीं की रंगत गुलाब में है
तेरी जलू में है माह-ए-तैबा, हिलाल हर मारग-ए-ज़िंदगी का,
हयात जाँ का रिक़ाब में है, मामात-ए-आदा का दाब में है
सियाह लिबासाने दार-ए-दुनिया वा सब्ज़पोशाने अर्श-ए-आला,
हर एक है उनके करम का प्यासा, ये फ़ैज़ उनकी जनाब में है
वो ग़ुल है लब-हाए नाज़ुक उनके हज़ारों झड़ते हैं फूल जिनसे,
ग़ुलाब गुलशन में देखे बुलबुल, ये देख गुलशन गुलाब में है
जली है सोज़-ए-जिगर से जान तक है त़ालिब-ए-जल्वा-ए-मुबारक,
दिखा दो वो लब की आब-ए-हैवान का लुत्फ़ जिनके ख़िताब में है
खड़े हैं मुनकर नक़ीर सर पर, न कोई हامی न कोई यावर,
बता दो आकर मेरे पैग़म्बर कि सख़्त मुश्किल जवाब में है
ख़ुदा-ए-ख़ैर है ग़ज़ब पर खुले हैं बदकारीयों के दफ़्तर,
बचा लो आकर शफ़ी-ए-महशर, तुम्हारा बन्दा अज़ाब में है
करीम ऐसा मिला कि जिसके खुले हैं हाथ और भरे ख़ज़ाने,
बताओ ऐ मुफ़्लिसो कि फिर क्यों तुम्हारा दिल इज़्तिराब में है
गुनाह की तारीकियॉं ये छाई, उमड़ के काली घटा आई,
ख़ुदा के खुर्शीद-ए-मेहर फ़रमा का ज़र्रा बस इज्तिराब में है
करीम अपने करम का सदक़ा ला-ईमी बे-क़द्र को न शर्मां,
तू और रज़ा से हिसाब लेना, रज़ा भी कोई हिसाब में है
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यह कलाम इमाम अहमद रज़ा खान (आला हज़रत) द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली नात है, जिसमें हुज़ूर ﷺ की नूरानियत और उनकी शफ़ाअत (सिफारिश) की मार्मिक पुकार की गई है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! अपने चेहरे से पर्दा हटा दीजिए क्योंकि दुनिया आपके नूर के बिना अंधेरी हो रही है। शायर कहता है कि जब क़ब्र में मुनकर-नक़ीर सवाल करेंगे या जब हश्र में गुनाहों का हिसाब होगा, तब केवल आपकी रहमत ही हमें बचा पाएगी, क्योंकि आपकी वाणी में 'आब-ए-हैवान' (अमरता का जल) जैसा आनंद है।
| शब्द | अर्थ (Hindi / English) |
|---|---|
| नूरे-बारी | ईश्वर का नूर / Divine Light |
| हिज़ाब / नक़ाब | पर्दा / Veil |
| तारीक | अंधेरा / Dark |
| इताब | क्रोध या नाराजगी / Wrath |
| शफ़ी-ए-महशर | हश्र में सिफारिश करने वाले / Intercessor |
| इज़्तिराब | बेचैनी / Restlessness |
| आब-ए-हैवान | जीवन देने वाला जल / Elixir of Life |
इस नात का सार यह है कि पूरी कायनात की रौनक और खुशबू हुज़ूर ﷺ के सदक़े में है। शायर 'रज़ा' विनती करते हैं कि ऐ अल्लाह के महबूब! हम जैसे गुनहगारों के पास हिसाब देने को कुछ नहीं है; जब हम मुश्किल में हों, तो आप अपनी रहमत का साया फ़रमा देना क्योंकि आपके पास करम के खजाने हर मुफ़्लिस (ग़रीब) के लिए खुले हैं।
शायर ने क़ब्र में मुनकर-नकीर के सवालों के वक़्त हुज़ूर ﷺ से क्या दरख़्वास्त की है?