मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
- 2 दिनों पहले fiber_manual_record 83 बार देखा गया
टाइटल : Ummat Ka Gum Hai Kya Koi Puche Huzoor Se
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अख्तर रज़ा खान अज़हरी असद इक़बाल कलकत्तावी
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी
जोड़ा गया : 04 Jul, 2022 07:15 AM IST
बार देखा गया : 3.7K बार डाउनलोड हुआ : 160
Time to read: 1 min read
translate बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:
Ummat Ka Gum Hai Kya Koi Puche Huzoor Se (X2)
Aansoo Chalak Chalak Pade Chasmane Noor Se
Iftar Kar Rahe Hai Madine Me Mustafa (x2)
Pani Se Ya Namak Se Ya Ajwa Khuzur Se (x2)
Aansoo Chalak Chalak Pade Chasmane Noor Se
Jibrel Kah Rahe Hai Farishto Ki Bazm Me (x2)
Payara Mera Belal Hai Jannat Ki Hoor Se
Jibrel Kahge Rahe Hai Farishto Ki Bazm Me (x2)
Kitna Haseen Belal Hai Jannat Ki Hoor Se
Is Waste Zakat Ko Lazim Kiya Gaya (x2)
Muflis Ke Ghar Me Roshni Pahuche Zaroor Se (x2)
Aansoo Chalak Chalak Pade Chasmane Noor Se
Dushman Bhi Chehra Dekhe Toh Woh Bhi Yehi Kahe (x2)
Akhtar Chamak Raha Hai Andhere Me Noor Se
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह अत्यंत भावुक और रूहानी नात शरीफ़ है, जिसमें अपनी उम्मत (अनुयायियों) के लिए पैगंबर मुहम्मद ﷺ की असीम व्याकुलता, हज़रत बिलाल (र.अ.) के आध्यात्मिक सौंदर्य, ज़कात के सामाजिक महत्व और महापुरुषों के नूरानी प्रभाव का सुंदर वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि यदि कोई यह जानना चाहता है कि अपनी उम्मत का दर्द क्या होता है, तो वह हुज़ूर ﷺ से पूछे, जिनकी पवित्र नूरानी आँखों (चश्माने नूर) से सदैव अपनी उम्मत की चिंता और उनकी भलाई के लिए आँसू छलक पड़ते थे। वे मदीना शरीफ़ में पानी, नमक या अजवा खजूर जैसी साधारण चीज़ों से बेहद सादगी के साथ इफ़्तार करते हैं और निरंतर अपनी उम्मत के ग़म में डूबे रहते हैं।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| चश्माने नूर | नूरानी आँखें / दिव्य दृष्टि |
| बज़्म | सभा / महफ़िल |
| अजवा | मदीना मुनव्वरा की एक विशेष और उत्तम खजूर |
| लाज़िम | अनिवार्य / आवश्यक (फ़र्ज़) किया गया |
| मुफ़्लिस | ग़रीब / निर्धन या लाचार |
कवि कहता है कि हुज़ूर ﷺ को अपनी उम्मत की इस क़दर फिक्र है कि उनकी आँखें हमेशा नम रहती हैं। कलाम में वर्णन है कि हज़रत जिबरील (अ.स.) फ़रिश्तों की सभा में हज़रत बिलाल (र.अ.) की सादगी और निष्ठा की प्रशंसा करते हुए उन्हें जन्नत की हूर से भी अधिक हसीन और प्रिय बताते हैं। इसके साथ ही, ज़कात व्यवस्था के पीछे का मूल उद्देश्य समझाया गया है कि इसके माध्यम से समाज के निर्धन लोगों के घरों तक भी ख़ुशी की रोशनी पहुँचे। अंत में कवि कहता है कि ईश्वर के प्रिय नबी के आशीर्वाद से अख्तर (ताजुश्शरिया) का मुखमंडल अंधकार में भी प्रकाश की तरह चमकता है।
नात के अनुसार, गरीबों और निर्धनों (मुफ़्लिस) के घर तक ख़ुशी की रोशनी पहुँचाने के लिए किस इस्लामी फ़र्ज़ को 'लाज़िम' (अनिवार्य) किया गया है?