मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां या रसूलअल्लाह
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : मुहम्मद अली ज़हूरी
नातख्वान/कलाकार: फरहान अली कादरी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 16 Sep, 2023 05:51 AM IST
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तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
हलीमा घर कदी वेखे, कदी सरकार नूँ वेखे
मैं कह दी सेज तेरे लाई सजावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
मेरा दिल वी ये चाहुंदा ऐ तुसी मेरे वी घर आओ
तेरी राहवां दे विच पल्कां विचहावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
जगाओ भाग मेरे वी अबू अयू़ब दे वंगूं
मुक़द्दर उस दा मैं कित्थों लियावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
मैं कुਝ वी नैँ जे तेरे नाल मेरी कोई नसब्त नैँ
मैं सब कुਝ हां जे मैं तेरा सदावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
सुना है आप हर आशिक़ के घर तशरीफ लाते हैं
मेरे घर में भी हो जाए चरागां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
मदीने पाक दे अंदर मेरी एहों इबादत ऐ
तेरे रौज़े तों न नज़रां हटावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
कोई तारीफ़ होवे ओस सोहणे दी, ज़हूरी वी
क़लम जामी दा मैं कित्थों लियावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा खावां मैं तेरे गीत गावां, या रसूलअल्लाह!
तेरा मीलाद मैं क्यूँ न मनावां, या रसूलअल्लाह!
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यह नात शरीफ़ हुज़ूर ﷺ की आमद की खुशी और उनके प्रति एक उम्मती के गहरे प्रेम और समर्पण का सुंदर चित्रण है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि जब मेरा पूरा जीवन और रिज़्क़ हुज़ूर ﷺ के सदके में है, तो मैं उनकी प्रशंसा के गीत क्यों न गाऊं। शायर की दिली तमन्ना है कि काश उसे भी हज़रत अबू अय्यूब अंसारी जैसा सौभाग्य मिले और वह हुज़ूर ﷺ की राहों में अपनी पलकें बिछा सके।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| खावां/गावां | खाता हूँ / गाता हूँ (पंजाबी शब्द) |
| मीलाद | जन्म का उत्सव (Celebration of Birth) |
| सेज | बिछौना या बिस्तर (Bed/Couch) |
| निसबत | संबंध या लगाव (Connection) |
| तशरीफ लाना | पधारना या आना (To arrive/visit) |
| चरागां | दीपों की रोशनी (Illumination) |
इस कलाम का मुख्य भाव यह है कि हुज़ूर ﷺ से जुड़ाव (निसबत) ही एक इंसान की असली पहचान है; उनके बिना हम कुछ नहीं और उनके नाम से ही सब कुछ हैं। शायर अपनी कमियों को स्वीकारते हुए कहता है कि चाहे उसके पास महान कवियों जैसा हुनर न हो, लेकिन हुज़ूर ﷺ की याद में महफ़िल सजाना ही उसकी सबसे बड़ी इबादत है।
इस नात में शायर ने अपनी किस्मत (भाग) को जगाने के लिए किस मशहूर सहाबी की मिसाल दी है?