اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : तैबा में लागल बाटे नूरी बाज़ार हो
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अली हैदर फ़ैज़ी लखनपुरी
नातख्वान/कलाकार: अली हैदर फ़ैज़ी लखनपुरी
जोड़ा गया : 07 Sep, 2025 09:07 AM IST
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तैबा में लागल बाटे नूरी बाज़ार हो,
हूरों मलाईक चूमें तुमरी मज़ार हो।
धरती चरण मा चूमे, झूमे संसार हो,
जगवा में आईगइलन रब के दिलदार हो।
तैबा में लागल बाटे नूरी बाज़ार हो।
प्यारे नबी के रहे अइसन बर्ताव हो,
कलमा पढ़त हैं जिनका सारा संसार हो।
मक्का से हिजरत करके तैबा में अइले आका,
दीन के खातिर छोड़लन आपन घर-बार हो।
तैबा में लागल बाटे नूरी बाज़ार हो,
हूरों मलाईक चूमें तुमरी मज़ार हो।
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यह कलाम भोजपुरी मिश्रित उर्दू में नबी-ए-करीम ﷺ की शान और मदीना (तैबा) की रौनकों का वर्णन करता है। इसमें बहुत ही सरल और ग्रामीण मिठास के साथ हुज़ूर ﷺ के बलिदान और उनके नूरानी दरबार की महिमा गाई गई है।
कवि कहता है कि मदीना में नूर का बाज़ार लगा है, जहाँ स्वर्ग की अप्सराएँ और फरिश्ते हुज़ूर ﷺ के रोज़ा-ए-अकबर को चूमते हैं। जब से रब के महबूब इस दुनिया में आए हैं, पूरी धरती उनके चरणों का सम्मान करती है और सारा संसार उनकी आमद की खुशी में झूम रहा है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नूरी बाज़ार | प्रकाश की रौनक / दिव्य वातावरण |
| मलाईक | फरिश्ते (Angels) |
| आईगइलन | आ गए हैं |
| बर्ताव (वेहवार) | व्यवहार / आचरण (Conduct) |
| कलमा | इस्लाम का मूल मंत्र / गवाही |
| हिजरत | मक्का से मदीना जाना (प्रवास) |
| घर-बार | घर और परिवार |
| संसार | दुनिया (World) |
इस नात का सार यह है कि इस्लाम (दीन) की रक्षा और प्रचार के लिए हुज़ूर ﷺ ने अपना घर-बार और शहर छोड़ दिया और मक्का से मदीना चले गए। उनका चरित्र (अखलाक) इतना महान था कि आज पूरी दुनिया उनकी मुरीद है। यह गीत मदीना की उस पवित्रता को दर्शाता है जहाँ आज भी नूर की वर्षा होती है और दैवीय शक्तियाँ उनके दर पर झुकती हैं।
"दीन के खातिर छोड़लन आपन घर-बार हो"—क्या यह पंक्ति हमें यह याद नहीं दिलाती कि सच्चाई और धर्म की राह में किए गए बलिदान ही इंसान को अमर बनाते हैं?