اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : तड़पेला जियरा बेचैन हमरा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : फिरोज अंजुम मधुपुरी
नातख्वान/कलाकार: फिरोज अंजुम मधुपुरी
जोड़ा गया : 07 Sep, 2025 02:30 PM IST
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तड़पेला जियरा, बेचैन हमरा,
तड़पेला जियरा, बेचैन सबका,
दर्शन कराइदा शाह-ए-मदीना
जब-जब पूरबी बहेला बयारिया,
तो याद आवेला तैबा नगरिया,
सोई किस्मत जगाइदा, नूरी रौज़ा दिखाइदा,
दर पे बुलाइला शाह-ए-मदीना
तड़पेला जियरा, बेचैन हमरा,
दर्शन कराइदा शाह-ए-मदीना
के रोज़े महशर तू लाज बचईह,
नफ़्सी-नफ़्सी मा बख़्शिश करईह,
आका बिगड़ी बनाईदा, एह नसीबा जगाइदा,
दर पे बुलाइला शाह-ए-मदीना
तड़पेला जियरा, बेचैन सबका,
दर्शन कराइदा शाह-ए-मदीना
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यह कलाम भोजपुरी और उर्दू के सुंदर मेल से बना है, जो सीधे दिल की भावनाओं को छूता है। इसमें एक प्रेमी की मदीना जाने की तड़प और हुज़ूर ﷺ के प्रति उसकी गहरी श्रद्धा को बहुत ही सरल और आत्मीय अंदाज़ में पेश किया गया है।
कवि कहता है कि मेरा मन मदीना के दर्शन के लिए तड़प रहा है और बहुत बेचैन है। जब भी पूरब से ठंडी हवा चलती है, तो मुझे मदीना की गलियों की याद आती है; ऐ मदीना के सुल्तान, अब मेरी सोई हुई किस्मत को जगा दीजिए और मुझे अपने नूरानी दरबार में बुला लीजिए।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जियरा | हृदय / मन (जी) |
| बयारिया | हवा / बयार |
| तैबा नगरिया | मदीना शहर |
| नूरी रौज़ा | प्रकाशमय मज़ार (नबी ﷺ का विश्राम स्थल) |
| रोज़-ए-महशर | प्रलय का दिन (कयामत) |
| लाज बचईह | सम्मान की रक्षा करना |
| नफ़्सी-नफ़्सी | वह समय जब सब अपने बारे में सोचेंगे (अफरा-तफरी) |
| बख़्शिश | मुक्ति / क्षमा |
इस नात का सार यह है कि एक भक्त प्रकृति के झोंकों (पूरबी हवा) में भी अपने महबूब की खुशबू महसूस करता है। वह न केवल इस दुनिया में मदीना की हाज़िरी की दुआ माँगता है, बल्कि कयामत के दिन की घबराहट में भी हुज़ूर ﷺ से मदद और बख्शिश की उम्मीद रखता है ताकि उसकी बिगड़ी हुई बात बन जाए।
"जब-जब पूरबी बहेला बयारिया"—क्या भोजपुरी की यह मिठास आपको मदीना की यादों में खो जाने पर मजबूर नहीं कर देती?