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शहर ए गुलशन कौन देखे दश्त ए तईबा छोड़ कर Lyrics In हिन्दी

(शहर-ए-गुलशन कौन देखे दश्त-ए-तईबा छोड़ कर, सुऐ जन्नत कौन जाए दर तुम्हारा छोड़ कर)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : शहर-ए-गुलशन कौन देखे दश्त-ए-तईबा छोड़ कर

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात

नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी

जोड़ा गया : 07 Aug, 2023 08:55 AM IST

बार देखा गया : 427

Time to read: 1 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

शहर-ए-गुलशन कौन देखे दश्त-ए-तईबा छोड़ कर,
सुऐ जन्नत कौन जाए दर तुम्हारा छोड़ कर।

सर-गुज़श्त-ए-ग़म कहूँ किसे तेरे होते हुए,
किस के दर पे जाऊँ तेरा आस्ताना छोड़ कर।

मर ही जाऊँ मैं अगर इस दर से जाऊँ दो क़दम,
क्या बचे बिमार-ए-ग़म क़ुर्ब-ए-मसीहा छोड़ कर।

बे-लिक़ा-ए-यार उनको चैन आजाता अगर,
बार बार आते न यूँ ज़िब्रायिल शिद्रा छोड़ कर।

बख्शवाना मुझ से आँसे का रवाँ होगा कैसे,
किस के दामन में छुपों दामन तुम्हारा छोड़ कर।

हश्र में इक इक मुन जो टकटे फिरते हैं उद्धो,
आफ़तों में फँस गए इनका सहारा छोड़ कर।

मर के जीते हैं जो उनके दर पे जाते हैं हसन,
जि के मरते हैं जो आते हैं मदीना छोड़ कर।

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह पंक्तियाँ मदीना शरीफ़ और नबी-ए-करीम ﷺ के पावन दर के प्रति अटूट प्रेम और दीवानगी को दर्शाती हैं। इसमें बताया गया है कि एक सच्चे आस्तिक (आशिक़) के लिए मदीने के रेगिस्तान और हुज़ूर ﷺ की चौखट के सामने स्वर्ग (जन्नत) के बाग़-बगीचे भी कोई मायने नहीं रखते।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि हुज़ूर ﷺ के होते हुए कोई अपने दुखों की कहानी किसी और को क्यों सुनाए, और मदीने की पवित्र धरती को छोड़कर कोई स्वर्ग की तरफ भी क्यों जाए। शायर कहता है कि जैसे कोई गंभीर बीमार अपने हकीम (मसीहा) से दूर होकर जी नहीं सकता, वैसे ही हुज़ूर ﷺ के दर से दो कदम दूर जाना भी रूहानी मौत के बराबर है।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्द (Word)अर्थ (Meaning)
दश्त-ए-तईबामदीने का रेगिस्तान / मदीने की ज़मीन
सुऐ जन्नतजन्नत की तरफ / स्वर्ग की ओर
सर-गुज़श्त-ए-ग़मदुखों की दास्तान / बीत बीती कहानी
आस्तानाचौखट / पवित्र दरबार
क़ुर्ब-ए-मसीहावैद या जीवनदाता की समीपता / नज़दीकी
बे-लिक़ा-ए-यारमहबूब (हुज़ूर ﷺ) के दीदार के बिना
शिद्रा (सिदरा)सिदरा-तुल-मुंतहा (सृष्टि की अंतिम सीमा का पवित्र वृक्ष)
आँसे (आसी)पापी / गुनहगार
उद्धो (अदू)दुश्मन / विरोधी

सारांश (Summary)

इस नात-ए-पाक में मदीना शरीफ़ की श्रेष्ठता को पूरी कायनात और जन्नत पर भी प्राथमिकता दी गई है, यहाँ तक कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम भी हुज़ूर ﷺ के दीदार की चाह में बार-बार 'सिदरा' छोड़कर धरती पर हाज़िर होते हैं। शायर 'हसन' (हसन रज़ा खान) अंत में कहते हैं कि जो मदीने की चौखट पर अपनी जान कुर्बान करते हैं वे अमर हो जाते हैं, और जो लोग मदीना छोड़कर वापस आते हैं, वे जीते जी मृत्यु के समान कष्ट पाते हैं।

शायर के मुताबिक जो लोग मदीना छोड़ कर आते हैं उनका क्या हाल होता है, और हज़रत जिब्रील बार-बार सिदरा छोड़ कर क्यों आते हैं?

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