मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : नेमते बांटता जिस सम्त वोह ज़ीशान गया
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: दिलबर शाही ओवैस रज़ा कादरी सज्जाद निज़ामी (मरहूम) सलीम रज़ा पिलीभीति
जोड़ा गया : 19 May, 2023 06:46 AM IST
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नेमते बांटता जिस सम्त वोह ज़ीशान गया,
साथ ही मुन्शिये रह़मत का क़लम-दान गया
ले ख़बर जल्द ही ग़ैरों की तरफ़ ध्यान गया,
मेरे मौला मेरे आक़ा तेरे कुरबान गया
आह वोह आंख कि नाकामे तमन्ना ही रही,
हाए वोह दिल जो तेरे दर से पुर अरमान गया
दिल है वोह दिल जो तेरी याद से मामूर रहा,
सर है वोह सर जो तेरे क़दमों पे कुरबान गया
उन्हें जाना उन्हें माना न रखा ग़ैर से काम,
लिल्लाहिल हम्द मैं दुन्या से मुस्लमान गया
और तुम पर मेरे आक़ा की इनायत न सही,
नज्दियो! कल्मा पढ़ाने का भी एह़सान गया
आज ले उनकी पनाह आज मदद मांग उनसे,
फिर न मानेंगे क़ियामत में अगर मान गया
उ़फ ये मुन्किर यह बढ़ा जोशे तअ़स्सुब आख़िर,
भीड़ में हाथ से कम बख़्त के ईमान गया
जानो दिल होशो ख़िरद सब तो मदीने पहुंचे,
तुम नहीं चलते रज़ा सारा तो सामान गया
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यह कलाम आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी द्वारा रचित एक बेहद प्रसिद्ध और प्रभावशाली नातिया शाहकार है। इसमें नबी करीम ﷺ की असीमित सख़ावत, शफ़ाअत (मदद) की अहमियत और ईमान की सलामती के महत्व को दृढ़ता से व्यक्त किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हमारे आक़ा ﷺ जिस ओर (सम्त) भी तशरीफ़ ले गए, उन्होंने अल्लाह की नेमतों और रहमतों को दोनों हाथों से लुटाया। कवि कहते हैं कि सच्चा और सफल दिल व सर वही है जो नबी की याद से आबाद रहे और उनके क़दमों पर न्योछावर हो जाए।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सम्त / ज़ीशान | दिशा / उच्च शान वाले (नबी ﷺ) |
| मुन्शिये रह़मत | अल्लाह की रहमत को लिखने/बांटने वाले |
| क़लम-दान | क़लम रखने का पात्र (यहाँ अधिकार या सत्ता से प्रतीक है) |
| मामूर | भरा हुआ / भरपूर या आबाद |
| लिल्लाहिल हम्द | अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है |
| जोशे तअ़स्सुब | कट्टरता या द्वेष का अंधा जोश |
| होशो ख़िरद | समझदारी और बुद्धि |
इस नात-ए-पाक का मुख्य सार यह है कि परलोक (क़ियामत) के दिन पछताने से बेहतर है कि इंसान आज ही इस दुनिया में नबी ﷺ की पनाह ले और उनसे शफ़ाअत (मदद) की भीख माँगे, क्योंकि मृत्यु के बाद वहाँ की गई तौबा स्वीकार नहीं होगी। कवि अंत में पूर्ण संतोष के साथ कहते हैं कि उन्होंने केवल अपने आक़ा को जाना-माना और किसी अन्य से कोई सरोकार नहीं रखा, जिससे उनका ईमान सुरक्षित रहा। वे स्वयं (रज़ा) से कहते हैं कि उनका दिल, जान और होश-ओ-हवाश तो पहले ही मदीने पहुँच चुके हैं, अब केवल जिस्म का वहाँ जाना बाक़ी है।
लिरिक्स के मुताबिक, सच्चा मुसलमान दुनिया से रुखसत होते वक्त किससे कोई काम (रिश्ता) नहीं रखता?