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Nana Ke Laad Pyar Ka Aisa Sila Diya Lyrics In हिन्दी


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टाइटल : Nana Ke Laad Pyar Ka Aisa Sila Diya

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : ताहिर रज़ा रामपुरी

नातख्वान/कलाकार: ताहिर रज़ा रामपुरी

जोड़ा गया : 26 Sep, 2022 03:00 PM IST

बार देखा गया : 1.4K बार डाउनलोड हुआ : 185

Time to read: 1 min read

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Nana Ke Laad Pyaar Ka Aisa Sila Diya,
Gardan Kata Ke Deen Ka Rutba Badha Diya

Dekar Lahu Ka Ek-ek Qatra Hussain Ne,
Karb O Bala Ke Zarron Ko Tara Bana Diya

Nana Ke Laad Pyaar Ka Aisa Sila Diya,
Gardan Kata Ke Deen Ka Rutba Badha Diya

Kyun Aaqibat Ka Tujhko Na Aaya Zara Khayal,
Kya Soch Ke Hussain Pe Khanjar Chala Diya

Nana Ke Laad Pyaar Ka Aisa Sila Diya,
Gardan Kata Ke Deen Ka Rutba Badha Diya

Pyare Nabi Ke Deen Par Zainab Ne Qeemti,
Apna Aziz Jaan Woh Heera Luta Diya

Nana Ke Laad Pyaar Ka Aisa Sila Diya,
Gardan Kata Ke Deen Ka Rutba Badha Diya

Tahir Salam Karta Hai Apne Hussain Ko,
Deene Nabi Ke Vaste Sab Kuch Luta Diya

Nana Ke Laad Pyaar Ka Aisa Sila Diya,
Gardan Kata Ke Deen Ka Rutba Badha Diya

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह भावपूर्ण मन्क़बत हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) द्वारा अपने नाना, हज़रत मोहम्मद ﷺ के धर्म (इस्लाम) की रक्षा के लिए दी गई ऐतिहासिक और महान क़ुरबानी का एक अत्यंत श्रद्धापूर्ण वर्णन है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि इमाम हुसैन (र.अ.) ने अपने नाना के लाड़-प्यार का ऋण इस तरह चुकाया कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपनी गर्दन कटा दी और इस्लाम के सम्मान को सर्वोच्च स्थान पर पहुँचा दिया। उन्होंने कर्बला की तप्त रेत पर अपने पवित्र रक्त की बूंदें बहाकर वहाँ के साधारण कणों (ज़र्रों) को भी सितारों की तरह हमेशा के लिए रौशन और अमर कर दिया।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ (Hindi)
सिलाबदला / प्रतिफल या इनाम
दीनधर्म / सत्य का मार्ग
रुतबामान-सम्मान / ऊँचा पद या मर्तबा
ज़र्रोंमिट्टी के छोटे कणों / धूल के कण
आक़िबतपरलोक / आख़िरत (मृत्यु के बाद का जीवन)
अज़ीज़-ए-जानप्राणों से प्रिय / बहुत लाडला

सारांश (Summary)

कवि कहता है कि इमाम हुसैन (र.अ.) ने इस्लाम की ख़ातिर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। वह उस क्रूर हत्यारे (शिम्र/यज़ीदी सेना) की सोच पर सवाल उठाता है जिसे नवासा-ए-रसूल पर ख़ंजर चलाते समय परलोक (आक़िबत) के न्याय का ज़रा भी भय नहीं लगा। इस धर्म-युद्ध में उनकी बहन हज़रत ज़ैनब (र.अ.) ने भी अपने प्राणों से प्यारे बेटों (हीरों) को धर्म पर कुर्बान कर दिया, जिसके लिए कवि 'ताहिर' इमाम हुसैन (र.अ.) के इस महान त्याग को शत-शत प्रणाम करता है।

शायर के अनुसार, ज़ालिम ने नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) पर ख़ंजर चलाते वक्त किस चीज़ का ज़रा भी ख़्याल नहीं किया था?

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