मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हैदर परवाज़
नातख्वान/कलाकार: हैदर परवाज़
जोड़ा गया : 05 Oct, 2022 07:01 PM IST
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इश्क मा हम पंछी कहेलाएंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
तैयबा नगर का हम है कबूतर
मीनार ओ गुंबद हमारा तो है घर
रोज़े का फेरा लगाएंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
इश्क मा हम पंछी कहेलाएंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
खुशियों की जहान है कोई गम नहीं है
तैयबा नगर खुल्द से कम नहीं है
ज़म ज़म से हर घड़ी नहायेंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
इश्क मा हम पंछी कहेलाएंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
आका के गांव में खजुरो की छाओं में
दिलकश हवा में मोअत्तर फ़ज़ाओं में
छोटा से एक घर बनाएंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
इश्क मा हम पंछी कहेलाएंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
परवाज़ को पर दे दे या रब्ब
नात कहने का हुनर दे दे या रब्ब
आका को जकार सुनाऐंगे
नबी नबी कह के मदीना उड जाएंगे
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यह मधुर नात शरीफ हज़रत मोहम्मद ﷺ की पावन संगति और मदीना मुनव्वरा की हाज़िरी के लिए एक आकुल भक्त के दिल की गहरी तड़प और रूहानी प्रेम का बेहद मनभावन चित्रण है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि पैगंबर ﷺ के प्रेम में मग्न भक्त का दिल एक आज़ाद पंछी बनकर उड़ना चाहता है, ताकि वह सीधे मदीना शरीफ पहुँच सके। वह स्वयं को 'तैयबा नगर' (मदीना) के मीनार और हरे गुंबद का एक ऐसा कबूतर बनाना चाहता है, जो दिन-रात उनके रौज़े की परिक्रमा (फेरे) करता रहे और उनके हुज़ूर अपनी हाज़िरी दर्ज कराए।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| तैयबा नगर | मदीना शरीफ का पवित्र नाम |
| गुंबद | गुंबद-ए-ख़िज़रा (मस्जिद-ए-नबवी का हरा गुंबद) |
| खुल्द | स्वर्ग / जन्नत |
| ज़म ज़म | एक पवित्र और बरकत वाला पानी (आब-ए-ज़मज़म) |
| मोअत्तर | सुगंधित / खुशबू से महकता हुआ |
| फ़ज़ाओं | वातावरण / हवाओं में |
| परवाज़ | उड़ान / पंखों की गति |
भक्त की दृष्टि में मदीना का पावन शहर किसी जन्नत से कम नहीं है, जहाँ सिर्फ आत्मिक आनंद की वर्षा होती है और दुःख का कोई नाम नहीं। वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसकी इस भक्तिमयी उड़ान (परवाज़) को पंख मिलें और उसे नात लिखने का ऐसा सुंदर हुनर प्राप्त हो, जिससे वह मदीना की दिलकश हवाओं और खजूरों की छाँव में छोटा सा घर बना सके और स्वयं आक़ा ﷺ को अपनी नात गाकर सुना सके।
शायर के अनुसार, मदीना शरीफ (तैबा नगर) जन्नत (खुल्द) से कम क्यों नहीं है और वहाँ पहुँच कर वह किस चीज़ से नहाने की बात कर रहा है?