اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : नाते रसूल पाक मिसरा है खूबतर
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी
जोड़ा गया : 11 Sep, 2025 01:44 PM IST
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नात-ए-रसूल पाक मिसरा है खूबतर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
इंसान तो इंसान है, कहते हैं जानवर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
दीदार-ए-मुस्तफ़ा को ये दिल बेक़रार था,
वो आ रहे हैं जिनका हमें इंतज़ार था,
उम्मत बरोज़-ए-हश्र कहेगी ये झूम कर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
नज़ारा जब किया तेरे हुस्न-ओ-जमाल का,
पानी उतर गया था फलक के हिलाल का,
प्यारे नबी को देख के ये कह उठा क़मर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
सरकार के चेहरे पे जब उनकी नज़र पड़ी,
हज़रत उमर के हाथ से तलवार गिर गई,
रूए नबी को देख कर बोले यही उमर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
दीदार जब तलक न हुआ था हुज़ूर का,
फूलों को अपने हुस्न-ए-मुजस्सम पे नाज़ था,
कहते हैं अब ये फूल भी आका को देख कर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
रूह-उल-अमीन सारा जहां घूम के बोले,
सरकार के क़दमों को यही चूम के बोले,
तुमसा हसीं कोई भी आया नहीं नज़र,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
जब इश्क़-ए-मुस्तफ़ा में वो सरशार हो गए,
अपनी ज़ुबान से वो सिद्दीक़ कह उठे,
हर फ़र्द मेरे घर का है क़ुर्बान आप पर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
दोनों जहाँ का तू हसीं इन्तेख़ाब है,
कैसे मिले जवाब के तू लाजवाब है,
बाद अज़ ख़ुदा बुज़ुर्ग तू ही, क़िस्सा मुख़्तसर,
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
या साहिब अल-जमाल वा या सैय्यद अल-बशर
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यह नात शरीफ़ हुज़ूर ﷺ के बेमिसाल सौंदर्य और उनकी महानता का एक ऐसा वर्णन है, जिसमें हज़रत जामी (r.a) के प्रसिद्ध अरबी मिसरे का उपयोग किया गया है। इसमें सृष्टि की हर चीज़ को उनकी सुंदरता का गुणगान करते हुए दिखाया गया है।
कवि कहता है कि नबी ﷺ का चेहरा इतना नूरानी है कि उसे देखकर आसमान के चाँद की चमक भी फीकी पड़ गई। उनकी सुंदरता का प्रभाव ऐसा है कि हज़रत उमर (r.a) जैसा साहसी व्यक्ति भी उनके चेहरे की शांति देखकर अपनी तलवार गिरा देता है, और पूरी कायनात उन्हें मानवता का श्रेष्ठतम गौरव मानती है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| साहिब अल-जमाल | सुंदरता के स्वामी / अत्यंत सुंदर |
| सैय्यद अल-बशर | समस्त मानव जाति के सरदार |
| बरोज़-ए-हश्र | कयामत (न्याय) के दिन |
| हिलाल / क़मर | चाँद (Moon) |
| हुस्न-ए-मुजस्सम | साक्षात सुंदरता / सुंदरता की मूर्ति |
| रूह-उल-अमीन | हज़रत जिब्राईल (A.S) (देवदूत) |
| सरशार | पूरी तरह डूबा हुआ या मदहोश |
| बाद अज़ ख़ुदा | ईश्वर के बाद |
इस नात का सार यह है कि ईश्वर के बाद इस पूरे ब्रह्मांड में सबसे ऊँचा और सम्मानित स्थान केवल हज़रत मोहम्मद ﷺ का है। कवि ने विभिन्न उदाहरणों से यह स्पष्ट किया है कि चाहे फ़रिश्ते हों, फूल हों या नबी के महान साथी, सभी उनके बेमिसाल हुस्न और रुतबे के सामने नतमस्तक हैं। "क़िस्सा मुख़्तसर" यानी संक्षेप में यही सत्य है कि उनके जैसा कोई दूसरा नहीं है।
"बाद अज़ ख़ुदा बुज़ुर्ग तू ही, क़िस्सा मुख़्तसर"—क्या यह एक पंक्ति नबी की पूरी शान को समेटने के लिए काफ़ी नहीं है?