मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शमीम रज़ा फ़ैज़ी
नातख्वान/कलाकार: शमीम रज़ा फ़ैज़ी
जोड़ा गया : 20 Feb, 2023 11:20 AM IST
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Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Aata Bhi Kaise Jab Allah Ne Banaya Hi Nahi
Koi Saani Na Hai Rab Ka Na Mere Aaqa Ka
Ek Ka Jism Nahi Ek Ka Saaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Koi Saani Na Hai Rab Ka Na Mere Aaqa Ka
Ek Ka Jism Nahi Ek Ka Saaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Kabr Mein Jab Kaha Sarkar Ne Tu Mera Hai
Phir Farishto Ne Mujhe Hath Lagaya Hi Nahi
Zulf Wallail Hai Rukh Wadduha Maa-zag Aankhen
Is Tarah Rab Ne Kisi Ko Bhi Sajaaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Laut Kar Aa Gaya Makke Se Madina Na Gaya
Kaise Jaata Tujhe Aaqa Ne Bulaaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Laut Kar Aa Gaya Makke Se Madina Na Gaya
Kaise Jaata Tujhe Aaqa Ne Bulaaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Jab Se Darwaze Pe Likha Hun Main Aala Hazrat
Koi Gustaakh-e-Nabi Ghar Mere Aaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Aap Ne Jab Se Nawaaza Hai Ya Rasoolallah
Maine Daman Kisi Chaukhat Pe Bichaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Jisne Sarkar Ke Chehre Ki Ziyarat Ki Hai
Us Ki Nazron Me Koi Aur Samaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Jb Talak Pusht Pe Shabbir Rahe Aye Faizi
Sar Ko Sajde Se Payambar Ne Uthaya Hi Nahi
Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahi
Aata Bhi Kaise Jab Allah Ne Banaya Hi Nahi
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यह अक़ीदत के रंगों से सराबोर एक बेहद मशहूर और रूहानी नात शरीफ़ है। इसमें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की बेमिसाल ख़ूबसूरती, उनके नूरानी वजूद (बिना साए की विशेषता) और अपनी उम्मत पर उनके असीम करम को काव्यात्मक रूप से बयां किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि पूरे ब्रह्मांड में हमारे आक़ा मुस्तफ़ा ﷺ के जैसा कोई दूसरा आ ही नहीं सकता, क्योंकि स्वयं अल्लाह ता'ला ने उनके जैसा किसी और को बनाया ही नहीं है। जैसे ईश्वर (रब) का कोई सानी यानी बराबरी करने वाला नहीं है, वैसे ही नबी ﷺ का भी कोई जोड़ नहीं है—अंतर बस इतना है कि ईश्वर का कोई भौतिक शरीर नहीं है और प्यारे नबी ﷺ का कोई साया (परछाईं) नहीं था।
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सानी | समान / बराबरी करने वाला या दूसरा (जोड़) |
| रुख़ / ज़ियारत | चेहरा या मुखड़ा / पवित्र दर्शन या दीदार |
| वल्लैल / वद्दुहा | रात और सुबह की रोशनी (क़ुरआन के शब्द, जो नबी ﷺ के बालों और चेहरे के लिए प्रयुक्त हुए हैं) |
| मा-ज़ाग़ | क़ुरआन का शब्द, जो नबी ﷺ की एकाग्र और पवित्र आँखों की विशेषता बताता है |
| गुस्ताख़-ए-नबी | पैग़ंबर साहब की शान में अपमान या गुस्ताख़ी करने वाला |
| पुश्त / पयम्बर | पीठ / पैग़ंबर यानी हुज़ूर ﷺ |
| शब्बीर | इमाम हुसैन का पवित्र नाम |
इस मुक़द्दस नात का मूल सार यह है कि अल्लाह ने अपने महबूब ﷺ के रूप और चरित्र को क़ुरआन की आयतों की तरह अद्वितीय सजाया है। शायर कहता है कि जिस पर रसूल-ए-पाक ﷺ की कृपा (नवाज़िश) हो जाए, उसे संसार में किसी और के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती; यहाँ तक कि क़ब्र में भी फ़रिश्ते उसे आक़ा ﷺ का वफ़ादार जानकर छोड़ देते हैं। अंत में इमाम हुसैन (शब्बीर) के बचपन का एक ख़ूबसूरत वाक़िया याद दिलाया गया है कि जब तक वह नबी ﷺ की पीठ (पुश्त) पर सवार रहे, तब तक हमारे पैग़ंबर ने अल्लाह के प्रति प्रेम और नवासे के लाड में अपना सिर सज्दे से नहीं उठाया।
लिरिक्स के मुताबिक, नबी ﷺ ने सज्दे से सर क्यों नहीं उठाया जब तक शब्बीर (इमाम हुसैन) उनकी पुश्त (पीठ) पर रहे?