मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मुस्तफ़ा आप के जैसा कोई आया ही नहीं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शमीम रज़ा फ़ैज़ी
नातख्वान/कलाकार: शमीम रज़ा फ़ैज़ी
जोड़ा गया : 20 Feb, 2023 11:20 AM IST
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मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
आता भी कैसे ! जब अल्लाह ने बनाया ही नहीं !
कोई सानी ना है रब का, ना मेरे आक़ा का
एक का जिस्म नहीं, एक का साया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
कोई सानी ना है रब का, ना मेरे आक़ा का
एक का जिस्म नहीं, एक का साया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
क़ब्र में जब कहा सरकार ने, ये मेरा है
फिर फ़रिश्तों ने मुझे हाथ लगाया ही नहीं
ज़ुल्फ़ वल्लैल है, रुख़ वद्दुहा, मा-ज़ाग़ आँखें
इस तरह रब ने किसी को भी सजाया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
लौट कर आगया मक्के से, मदीना ना गया
कैसे जाता ! तुझे आक़ा ने बुलाया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
लौट कर आगया मक्के से, मदीना ना गया
कैसे जाता ! तुझे आक़ा ने बुलाया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
जब से दरवाज़े पे लिखा हूँ मैं आला हज़रत
कोई गुस्ताख़-ए-नबी घर मेरे आया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
आप ने जब से नवाज़ा है, या रसूलल्लाह !
मैंने दामन किसी चौखट पे बिछाया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
जिस ने सरकार के चेहरे की ज़ियारत की है
उस की नज़रों में कोई और समाया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
जब तलक पुश्त पे शब्बीर रहे, ऐ फ़ैज़ी !
सर को सज्दे से पयम्बर ने उठाया ही नहीं
मुस्तफ़ा ! आप के जैसा कोई आया ही नहीं !
आता भी कैसे ! जब अल्लाह ने बनाया ही नहीं !
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यह अक़ीदत के रंगों से सराबोर एक बेहद मशहूर और रूहानी नात शरीफ़ है। इसमें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की बेमिसाल ख़ूबसूरती, उनके नूरानी वजूद (बिना साए की विशेषता) और अपनी उम्मत पर उनके असीम करम को काव्यात्मक रूप से बयां किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि पूरे ब्रह्मांड में हमारे आक़ा मुस्तफ़ा ﷺ के जैसा कोई दूसरा आ ही नहीं सकता, क्योंकि स्वयं अल्लाह ता'ला ने उनके जैसा किसी और को बनाया ही नहीं है। जैसे ईश्वर (रब) का कोई सानी यानी बराबरी करने वाला नहीं है, वैसे ही नबी ﷺ का भी कोई जोड़ नहीं है—अंतर बस इतना है कि ईश्वर का कोई भौतिक शरीर नहीं है और प्यारे नबी ﷺ का कोई साया (परछाईं) नहीं था।
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सानी | समान / बराबरी करने वाला या दूसरा (जोड़) |
| रुख़ / ज़ियारत | चेहरा या मुखड़ा / पवित्र दर्शन या दीदार |
| वल्लैल / वद्दुहा | रात और सुबह की रोशनी (क़ुरआन के शब्द, जो नबी ﷺ के बालों और चेहरे के लिए प्रयुक्त हुए हैं) |
| मा-ज़ाग़ | क़ुरआन का शब्द, जो नबी ﷺ की एकाग्र और पवित्र आँखों की विशेषता बताता है |
| गुस्ताख़-ए-नबी | पैग़ंबर साहब की शान में अपमान या गुस्ताख़ी करने वाला |
| पुश्त / पयम्बर | पीठ / पैग़ंबर यानी हुज़ूर ﷺ |
| शब्बीर | इमाम हुसैन का पवित्र नाम |
इस मुक़द्दस नात का मूल सार यह है कि अल्लाह ने अपने महबूब ﷺ के रूप और चरित्र को क़ुरआन की आयतों की तरह अद्वितीय सजाया है। शायर कहता है कि जिस पर रसूल-ए-पाक ﷺ की कृपा (नवाज़िश) हो जाए, उसे संसार में किसी और के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती; यहाँ तक कि क़ब्र में भी फ़रिश्ते उसे आक़ा ﷺ का वफ़ादार जानकर छोड़ देते हैं। अंत में इमाम हुसैन (शब्बीर) के बचपन का एक ख़ूबसूरत वाक़िया याद दिलाया गया है कि जब तक वह नबी ﷺ की पीठ (पुश्त) पर सवार रहे, तब तक हमारे पैग़ंबर ने अल्लाह के प्रति प्रेम और नवासे के लाड में अपना सिर सज्दे से नहीं उठाया।
लिरिक्स के मुताबिक, नबी ﷺ ने सज्दे से सर क्यों नहीं उठाया जब तक शब्बीर (इमाम हुसैन) उनकी पुश्त (पीठ) पर रहे?