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मुझ पे भी चश्म ए करम ऐ मेरे आका करना Lyrics In हिन्दी

(मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना, हक़ तो मेरे भी है रहमत का तक़ाज़ा करना)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात

नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी

जोड़ा गया : 01 Aug, 2023 06:09 PM IST

बार देखा गया : 1.1K

Time to read: 2 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना,
हक़ तो मेरे भी है रहमत का तक़ाज़ा करना।

तू किसी को भी उठाता नहीं अपने दर से,
ये तेरी शान के शायाँ नहीं ऐसा करना।

मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना।

मैं एक ज़र्रा हूँ, मुझे ऊसात-ए-सहरा दे दे,
ये तेरे बस में है क़तरे को भी दरिया करना।

मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना।

चाँद की तरह तेरे गर्द वो तारों का हुजूम,
वो तेरा हल्क़ा-ए-अशाब में बैठा करना।

मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना।

ये तेरी शान है, ऐ आमिना के दुर्गे यतीम,
सारी उम्मत की शफ़ाअत तुझे तन्हा करना।

मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना।

मुझ पे महशर में नसीर उनकी नज़र पड़ ही गई,
कहने वाले इसे कहते हैं ख़ुदा करना।

मुझ पे भी चश्म-ए-करम ऐ मेरे आका करना,
हक़ तो मेरे भी है रहमत का तक़ाज़ा करना।

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह सुप्रसिद्ध और अत्यंत मार्मिक नात-ए-पाक (पीर नसीरुद्दीन नसीर द्वारा रचित) हुज़ूर पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की बारगाह में एक बेबस उम्मती की भावभीनी अर्ज़ी है, जिसमें नबी ﷺ की असीम दयालुता और उनकी शफ़ाअत (सहायता) पर गहरा विश्वास प्रकट किया गया है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि हे मेरे आक़ा ﷺ! मुझ पर भी अपनी कृपादृष्टि (चश्म-ए-करम) बनाए रखना, क्योंकि आपका उम्मती होने के नाते मेरा भी यह अधिकार है कि मैं आपकी दया की भीख माँगूँ। आप अपने द्वार से कभी किसी सवाली को ख़ाली हाथ नहीं लौटाते और न ही ऐसा करना आपकी महान प्रतिष्ठा के अनुकूल है।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्द (Word)अर्थ (Meaning)
चश्म-ए-करमकृपादृष्टि / दया की नज़र
तक़ाज़ामाँग या दावा करना
शायाँयोग्य / शोभा देने वाला
ऊसात-ए-सहरामरुस्थल (रेगिस्तान) की विशालता
हल्क़ा-ए-अशाबसाथियों (सहाबा) का घेरा या समूह
दुर्रे यतीमअनोखा और अनमोल मोती (नबी ﷺ के लिए प्रयुक्त)
तने तन्हाबिल्कुल अकेले ही

सारांश (Summary)

इस नात का मुख्य सार यह है कि नबी-ए-करीम ﷺ की महिमा निराली है; वे अपने साथियों के बीच ऐसे सुशोभित होते हैं मानो तारों के झुरमुट में स्वयं चाँद बैठे हों। वे इतने सामर्थ्यवान हैं कि एक अदने से कण (ज़र्रे) को मरुस्थल जैसी विशालता दे सकते हैं और प्रलय के दिन अकेले ही पूरी उम्मत का बेड़ा पार लगाएंगे। अंत में शायर 'नसीर' कहते हैं कि न्याय के मैदान (महशर) में जब नबी ﷺ की रहमत की नज़र उन पर पड़ी, तो दुनिया वालों को ऐसा लगा मानो ईश्वर ने स्वयं उनकी सोई हुई क़िस्मत बदल दी हो।

लिरिक्स के मुताबिक, सारी उम्मत की शफ़ाअत (बख़्शिश) तने तन्हा (अकेले ही) कौन करेगा?

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