मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मुझ ख़ताकार सा इंसान मदीने में रहे
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 08 Aug, 2023 12:35 PM IST
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मदीना मदीना, मदीना मदीना,
मदीना मदीना, मदीना मदीना
बड़ी दूर मदीना तोरा,
यहाँ जिया न लगे मोरा,
बैठा हूँ मैं आस लगाए,
मोरी किस दिन होगी हाज़िरी,
मोरा जीवन बिता जाए
मुझ ख़ताकार सा इंसान मदीने में रहे,
बनके सरकार का मेहमान मदीने में रहे
याद आती है मुझे अहल-ए-मदीना की वो बात,
ज़िंदा रहना हो तो इंसान मदीने में रहे
बड़ी दूर मदीना तोरा,
यहाँ जिया न लगे मोरा
यूं अदा करते हैं अश्शाक मोहब्बत की नमाज़,
सज्दा काबे में हो और ध्यान मदीने में रहे
मुझ ख़ताकार सा इंसान मदीने में रहे
उनकी शफ़क़त ग़म-ए-कौनैन भुला देती है,
जितने दिन आप का मेहमान मदीने में रहे
बड़ी दूर मदीना तोरा,
यहाँ जिया न लगे मोरा
दूर रहकर भी उठाता हूँ हुज़ूरी के मज़े,
मैं यहाँ और मेरी जान मदीने में रहे
मुझ ख़ताकार सा इंसान मदीने में रहे
छोड़ आया हूँ दिलो-जान ये कहकर आज़म,
आ रहा हूँ मेरा सामान मदीने में रहे
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यह पावन नात-ए-पाक एक आशिक़-ए-रसूल के दिल की तड़प, मदीना मुनव्वरा की दूरी के दर्द और वहाँ हाज़िर होने की उसकी गहरी रूहानी ख़्वाहिश का एक बेहद भावुक और सुंदर चित्रण है।
इस कलाम का अर्थ है कि मदीना शरीफ़ बहुत दूर है जिसके कारण आशिक़ का दिल इस मतलबी दुनिया में नहीं लगता और वह दिन-रात सरकार ﷺ का मेहमान बनने की आस लगाए बैठा है। शायर कहता है कि सच्चे प्रेमी (उश्शाक़) अपनी भक्ति की नमाज़ इस तरह पढ़ते हैं कि उनका शरीर भले ही काबा शरीफ़ में हो, मगर उनका पूरा ध्यान और रूह मदीना मुनव्वरा में टिकी होती है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Hindi / English Meaning) |
|---|---|
| जिया / मोरा | दिल या मन / मेरा (Heart / My) |
| हाज़िरी | दरबार में उपस्थित होना (Presence / Attendance) |
| ख़ताकार | पापी या गुनहगार (Sinner / Faulty) |
| अहल-ए-मदीना | मदीना के रहने वाले लोग (People of Madina) |
| उश्शाक़ | प्रेमीगण — आशिक़ शब्द का बहुवचन (Lovers) |
| शफ़क़त | दया, कृपा या ममता (Kindness / Affection) |
| ग़म-ए-कौनैन | दोनों जहानों के दुःख-दर्द (Sorrows of both worlds) |
| हुज़ूरी | सामने उपस्थित होने का आनंद (Being in presence) |
मदीना वह मुक़द्दस मुक़ाम है जहाँ हुज़ूर ﷺ की शफ़क़त इंसान को दुनिया और आख़िरत के सारे ग़म भुला देती है। शायर 'आज़म' फ़रमाते हैं कि एक सच्चे प्रेमी का वजूद दुनिया में कहीं भी रहे, मगर उसकी आत्मा हमेशा मदीने की गलियों में ही बसी रहती है, क्योंकि मदीने से दूर रहकर जीना असल में जीना ही नहीं है।
इस नात के मुताबिक, उश्शाक़ (आशिक़ों) की मोहब्बत की नमाज़ कैसी होती है और उनका ध्यान कहाँ रहता है?