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मेरे आका मदीने बुला लीजिए Lyrics In हिन्दी

(मेरे आका मदीने बुला लीजिए, सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : मेरे आका मदीने बुला लीजिए

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात

नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी

जोड़ा गया : 14 Apr, 2026 05:22 PM IST

बार देखा गया : 367

Time to read: 4 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

मेरे आका मदीने बुला लीजिए,
मेरे आका मदीने बुला लीजिए

सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए,
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए

तैबा के जाने वाले, जा कर बड़े अदब से,
मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शाह-ए-अरब से

कहना कि शाह-ए-आलम, एक रंज-ओ-ग़म का मारा,
दोनों जहाँ में जिसका हैं आप ही सहारा

हालत-ए-पुर्अलम से इस दम गुज़र रहा है,
और काँपते लबों से फ़रियाद कर रहा है

पाए गुनाह अपना है, दोष पर उठाए,
कोई नहीं है ऐसा जो पूछने को आए

भूला हुआ मुसाफ़िर मंज़िल को ढूँढता है,
तारीकियों में माह-ए-कामिल को ढूँढता है

सीने में है अँधेरा, दिल है सियाह खाना,
ये है मेरी कहानी सरकार को सुनाना

कहना मेरे नबी से महरूम हूँ ख़ुशी से,
सरवर क़ब्र-ए-ग़म है, अश्कों से आँख नम है

पामाल-ए-ज़िंदगी हूँ, सरकार उम्मती हूँ,
उम्मत के रहनुमा हो, कुछ अर्ज़-ए-हाल सुन लो

फ़रियाद कर रहा हूँ मैं दिल-फिगार कब से,
मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना मेरे नबी से

हज़ूर ऐसा कोई इंतज़ाम हो जाए,
सलाम के लिए हाज़िर ग़ुलाम हो जाए

सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए,
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए

मेरा दिल तड़प रहा है, जल रहा है सीना,
कि दवा वहीं मिलेगी, मुझे ले चलो मदीना

नहीं माल-ओ-ज़र तो क्या है, मैं ग़रीब हूँ यही ना,
मेरे इश्क़ मुझको ले चल तू ही जानिब-ए-मदीना

आका न टूट जाए ये दिल का आबगीना,
अब के बरस भी मौला रह जाऊँ मैं कहीं ना

दिल रो रहा है जिनका आँसू छलक रहे हैं,
उन आशिकों के सदके बुलवा लीजिए मदीना

मदीने जाऊँ फिर आऊँ, दोबारा फिर जाऊँ,
ये ज़िंदगी मेरी यूँ ही तमाम हो जाए

ऐ आज़िम-ए-मदीना, जा कर नबी से कहना,
सौ दर्द-ओ-अलम से अब जल रहा है सीना

कहना कि बढ़ रही है अब दिल की इज़्तिराबी,
कदमों से दूर हूँ मैं, क़िस्मत की है खराबी

कहना कि दिल में मेरे अरमान भरे हुए हैं,
कहना कि हसरतों के नश्तर चुभे हुए हैं

है आरज़ू ये दिल की मैं भी मदीना जाऊँ,
सुल्तान-ए-दो जहाँ को दाग़-ए-जिगर दिखाऊँ

काटूँ हज़ार चक्कर तैबा की हर गली का,
यूँ ही गुज़ार दूँ मैं अय्याम ज़िंदगी का

फूलों पे जान निसारूँ, काँटों पे दिल को वारूँ,
ज़र्रों को दूँ सलामी, दर की करूँ गुलामी

दीवार-ओ-दर को चूमूँ, चौखट पे सर को रख दूँ,
रोज़े को देख कर मैं रोता रहूँ बराबर

हम सब के दिल में है ये हसरत न जाने कब से,
मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शाह-ए-अरब से

एक रोज़ होगा जाना सरकार की गली में,
होगा वहीं ठिकाना सरकार की गली में

दिल में नबी की यादें, लब पर नबी की नातें,
जाना तो ऐसे जाना सरकार की गली में

या मुस्तफ़ा ख़ुदारा दो इज़्न हाज़िरी का,
कर लूँ नज़ारा आकर मैं आपकी गली का

इक बार तो दिखा दो रमज़ान में मदीना,
आका हमें दिखा दो रमज़ान में मदीना

बेशक बना लो आका मेहमान दो घड़ी का,
नसीब वालों में मेरा भी नाम हो जाए

जो ज़िंदगी की मदीने में शाम हो जाए

मेरे आका मदीने बुला लीजिए…

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह नात-ए-पाक एक आशिक-ए-रसूल की दिली तड़प और मदीने की हाज़िरी की गहरी चाहत को बयाँ करती है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

  • सहारा चाहिए सरकार...: कवि का मानना है कि इस कठिन जीवन को जीने के लिए उसे केवल हुज़ूर ﷺ की दया और संरक्षण की ज़रूरत है, जिसके बिना वह अधूरा है।
  • तारीकियों में माह-ए-कामिल...: वह खुद को अंधेरे में भटका हुआ मुसाफ़िर कहता है जो 'माह-ए-कामिल' (पूर्ण चंद्रमा/नबी ﷺ) की रोशनी की तलाश में है ताकि उसका दिल रोशन हो सके।
  • नहीं माल-ओ-ज़र तो क्या...: यहाँ भक्त कहता है कि भले ही उसके पास धन-दौलत (सफ़र के साधन) नहीं है, लेकिन उसका 'इश्क़' ही उसे मदीने तक पहुँचाने का ज़रिया बनेगा।

शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
शाह-ए-अरबअरब के राजा (मुहम्मद ﷺ)
क़िस्सा-ए-ग़मदुःख की कहानी
माह-ए-कामिलपूरा चाँद (नबी ﷺ के लिए उपमा)
सियाह खानाकाला घर / अंधेरा कमरा
महरूमवंचित (Deprived)
दिल-फिगारदुखी हृदय वाला
आबगीनाकाँच का बर्तन / आईना (नाज़ुक दिल)
आज़िम-ए-मदीनामदीना जाने वाला यात्री
इज़्तिराबीबेचैनी / व्याकुलता
नश्तरचुभने वाला औज़ार / काँटा
इज़्नअनुमति / आज्ञा

सारांश (Summary)

इस नात में एक भक्त अपने गुनाहों की माफ़ी और तन्हाई का ज़िक्र करते हुए पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ से मदीना बुलाने की इल्तिजा कर रहा है। वह अपनी बेबसी और दुख बयां करते हुए कहता है कि उसके जीवन का एकमात्र सहारा नबी की ज़ियारत है, और उसकी अंतिम इच्छा यही है कि उसकी ज़िंदगी की शाम मदीने की गलियों में हो।

शायर ने "नहीं माल-ओ-ज़र तो क्या है" कहकर मदीना जाने के लिए किस चीज़ को अपनी सबसे बड़ी ताक़त बताया है?

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