मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मरहबा बोलो मरहबा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : मौलाना जमील उर रहमान कादरी रहमतुल्लाह अलैह
नातख्वान/कलाकार: फरहान अली कादरी गुलाम मुस्तफा कादरी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 19 Aug, 2023 09:19 AM IST
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मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
मुमिनो वक़्त-ए-अदब है,
आमद-ए-महबूब-ए-रब है,
जाए-अदब-ओ-तरब है,
आमद-ए-शाह-ए-अरब है
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
बज रहे हैं शादियाने,
बुत लगे कलिमा सुनाने,
हर ज़बान पर हैं तराने,
आमद-ए-शाह-ए-अरब है
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
अब्र-ए-रहमत छा गया है,
काबे पे झंडा गड़ा है,
बाब-ए-रहमत आज वा है,
आमद-ए-शाह-ए-अरब है
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
बादलियाँ रहमत की छाईं,
बूंदियाँ रहमत की आईं,
अब मुरादें दिल की पाईँ,
आमद-ए-शाह-ए-अरब है
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
आने वाला है वो प्यारा,
दोनों आलम का सहारा,
काबे का चमका सितारा,
आमद-ए-शाह-ए-अरब है
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
आमिना बीबी का जाया,
बारहवीं तारीख़ आया,
सुब्ह-ए-सादिक़ ने सुनाया,
सलवातुल्लाही अलैका
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
उठो, आया ताज वाला,
अर्श की आँखों का तारा,
सब कहो, ऐ माह-ए-तयबा,
सलवातुल्लाही अलैका
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
दीन का हो बोलबाला,
सुनियों का रुख़ उजाला,
दुश्मनों का मुँह हो काला,
सलवातुल्लाही अलैका
मरहबा, बोलो मरहबा मरहबा,
झूम कर बोलो मरहबा
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यह नात शरीफ़ हुज़ूर ﷺ की आमद के स्वागत और उस समय कायनात में छाई खुशी का एक रूहानी मंज़र पेश करती है। इसमें बताया गया है कि नबी ﷺ के आने से रहमत के दरवाज़े खुल गए और हर तरफ नूर छा गया।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि यह समय अत्यंत अदब और खुशी का है क्योंकि अल्लाह के महबूब और अरब के सुल्तान ﷺ तशरीफ़ ला रहे हैं। उनके आने की खुशी में काबे पर झंडा गाड़ा गया और जड़ बुत भी उनकी शान में कलिमा पढ़ने लगे, जिससे मुमिनों के दिलों की मुरादें पूरी हो गईं।
| शब्द | अर्थ (हिंदी / English) |
|---|---|
| शाह-ए-अरब | अरब के सुल्तान (नबी ﷺ) / King of Arabia |
| तरब | हर्ष या उल्लास / Joy or Delight |
| शादियाने | खुशी के नगाड़े / Celebration drums |
| अब्र-ए-रहमत | दया के बादल / Clouds of Mercy |
| बाब-ए-रहमत | दया का दरवाज़ा / Door of Mercy |
| वा | खुला हुआ / Open |
हुज़ूर ﷺ रबी-उल-अव्वल की बारहवीं तारीख को 'काबे के सितारे' बनकर तशरीफ़ लाए, जिनके स्वागत में पूरी कायनात 'मरहबा' पुकार रही है। सुब्ह-ए-सादिक़ की वह घड़ी रहमतों की बारिश लेकर आई, जिसने न केवल बुतों को झुका दिया बल्कि दीन का बोलबाला भी कर दिया। शायर अंत में दुआ करता है कि आक़ा ﷺ के सदक़े मुमिनों के चेहरे हमेशा रोशन रहें।
नात के मुताबिक, काबे पर झंडा कब गाड़ा गया और उनकी आमद पर बुतों (मूर्तियों) का क्या हाल हुआ?