मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हुजूर मुफ्ती आज़म ए हिंद मुस्तफा रज़ा खान नूरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 29 Sep, 2023 08:12 AM IST
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मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
हबीब-ए-ख़ुदा का नज़ारा करूँ मैं,
दिल ओ जान उनपर निसारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
मुझे अपनी रहमत से तू अपना कर ले,
सिवा तेरे सब से किनारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
ख़ुदा रा अब आओ कि दम है लबों पर,
दम-ए-वसपीन तो नज़ारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
मुझे हाथ आए अगर ताज-ए-शाही,
तेरी कफ़्श-ए-पा पर निसारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
तेरा ज़िक्र लब पर, ख़ुदा दिल के अंदर,
यूंही ज़िंदगी गुज़ारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
दम-ए-वसपीन तक तेरे गीत गाऊँ,
मुहम्मद मुहम्मद पुकारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
तेरे दर के होते कहाँ जाऊँ, प्यारे!
कहाँ अपना दामन पसारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
ख़ुदा ख़ैर से लाए वो दिन भी, नूरी!
मदीने की गलियाँ बहारा करूँ मैं
मैं सो जाऊँ या मुस्तफ़ा कहते कहते,
खुले आँख सल्ले-अला कहते कहते
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यह सुंदर नातिया कलाम एक सच्चे आशिक़-ए-रसूल की उस दिली आरज़ू को बयां करता है, जिसमें वह अपनी हर साँस और पूरी ज़िंदगी को हुज़ूर ﷺ की याद में फ़ना कर देना चाहता है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि भक्त की इच्छा है कि सोते समय उसके होंठों पर नबी ﷺ का नाम हो और जागते ही उनकी प्रशंसा (सल्ले-अला) हो। शायर चाहता है कि जीवन के अंतिम क्षणों (दम-ए-वापसीं) में उसे अपने आक़ा ﷺ का दीदार नसीब हो और वह दुनिया की हर चीज़ को त्याग कर केवल उन्हीं का होकर रह जाए।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निसारा | न्योछावर या समर्पित करना |
| सिवा | अलावा या छोड़कर |
| दम-ए-वापसीं | अंतिम साँस या मृत्यु का समय |
| ताज-ए-शाही | राजा का मुकुट या राजपाट |
| कफ़्श-ए-पा | पैरों की जूतियाँ या खड़ाऊँ |
| बहारा करूँ | झाड़ू लगाना या सफ़ाई करना |
इस कलाम का सार यह है कि एक मोमिन के लिए दुनिया की बादशाही (ताज-ए-शाही) का कोई मूल्य नहीं है, वह इसे हुज़ूर ﷺ के चरणों की धूल पर कुर्बान करने को तैयार है। शायर दुआ करता है कि उसके दिल में ईश्वर (ख़ुदा) की याद और जुबान पर मुहम्मद ﷺ का नाम हमेशा बना रहे। उसकी अंतिम इच्छा मदीने की गलियों की सेवा करना और अपनी जान उन्हीं की राह में न्योछावर करना है।
शायर ने "ताज-ए-शाही" के मुक़ाबले में किस चीज़ को निसार करने की बात कही है और क्यों?