मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मदीने की गलियाँ वो रोज़े की जाली
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : मोहम्मद फ़ैज़ आलम मनकुआ मुरादाबादी
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 22 Sep, 2024 01:26 PM IST
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मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है,
बुला लो ऐ आक़ा, गुनहगार को भी,
मदीने को जाऊँ, ये दिल कह रहा है।
वो मस्जिदे-नबवी, वो मिंबर तुम्हारा,
जहाँ आपने है ख़ुत्बा सुनाया,
वो नूरानी मस्जिद, वो नूरानी मिंबर,
देखूँ मैं जाकर, ये दिल कह रहा है।
मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है…
वो गुम्बद तुम्हारा, जो जन्नत बक़ी है,
वो नूरानी मंज़र, वो नूरानी क़ब्रें,
वो वादी का मंज़र, नज़ा में बसा के,
मैं देखूँ मदिना, ये दिल कह रहा है।
मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है…
वहाँ की हवाओं में ख़ुशबू तुम्हारी,
वहाँ की फ़िज़ाओं में रंगत तुम्हारी,
वो नूरानी गलियों में नूर तुम्हारा,
वहाँ आ के देखूँ, ये दिल कह रहा है।
मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है…
जन्नत बक़ी में, वो नूरानी क़ब्रें,
जहाँ से है आक़ा का रौज़ा चमक के,
क़दमों में आक़ा के इतना मज़ा है,
वहीं दफ़न होना, ये दिल कह रहा है।
मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है…
गुनाहों में डूबा, ये आशिक़ तुम्हारा,
बड़ा बेख़बर है, बड़ा बेसहारा,
करम कीजिए फ़ैज़ पर भी ऐ आक़ा,
गुनाह बख्शवाऊँ, ये दिल कह रहा है।
मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है…
गुनहगार हूँ मैं, ख़ता कर हूँ मैं,
ये दुनिया की बातों में डूबा हूँ मैं,
बचा लो ऐ आक़ा, इस दुनिया से मुझ को,
मुझे अब बुलाओ, ये दिल कह रहा है।
मदीने की गलियाँ, वो रोज़े की जाली,
मदीने को देखूँ, ये दिल कह रहा है…
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यह नात एक विह्वल भक्त की पुकार है जो मदीना शरीफ़ की तीर्थयात्रा के लिए अत्यंत व्याकुल है। इसमें एक गुनहगार बंदे की अपने आक़ा ﷺ के दरबार में हाज़िरी और वहीं जीवन के अंत की पवित्र इच्छा का वर्णन है।
इन पंक्तियों में शायर मदीना की गलियों, गुम्बद-ए-खिज़रा और जन्नत-उल-बक़ी के पवित्र दृश्यों को अपनी आँखों से देखने की आरज़ू कर रहा है। वह अपने गुनाहों की माफ़ी के लिए आक़ा ﷺ के करम का तलबगार है और चाहता है कि उसे दुनिया की मोह-माया से बचाकर मदीना बुला लिया जाए।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| रोज़े की जाली | हुज़ूर ﷺ की मज़ार के चारों ओर की पवित्र जालियाँ |
| ख़ुत्बा | धार्मिक उपदेश |
| मिंबर | मस्जिद में ऊँचा स्थान जहाँ से उपदेश दिया जाता है |
| जन्नत बक़ी | मदीना का प्रसिद्ध और पवित्र कब्रिस्तान |
| फ़िज़ा | वातावरण या माहौल |
| ख़ता कर | गलतियाँ करने वाला या पापी |
इस कलाम का सार यह है कि एक सच्चा आशिक़ दुनियावी दुखों और अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए केवल मदीना की शरण चाहता है। उसकी दिली तमन्ना है कि वह मदीना की नूरानी आब-ओ-हवा में साँस ले और अंततः वहीं की पाक मिट्टी (जन्नत-उल-बक़ी) में दफ़न होकर अमर हो जाए।
नात के आखिरी बंद (पद) में शायर ने खुद को दुनिया की बातों में डूबा हुआ बताकर आक़ा ﷺ से क्या इल्तेजा की है?