नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर
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टाइटल : मदीने में जो गुज़रा वो ज़माना याद आता है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 08 Aug, 2023 02:05 PM IST
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दरे अकदस पे हाल-ए-दिल सुनाना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है,
मदीने में जो गुज़रा वो ज़माना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है
अदब से बैठ कर उस गुम्बदे ख़ज़रा के साये में,
नबी की याद में आँसू बहाना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है
रसूलल्लाह के दरबार में उनकी मोहब्बत में,
ये तेरा रोज़-शब का आना-जाना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है
औवेस क़रनी बोले माँ इजाज़त दीजिए मुझको,
जुदाई में तड़पता हूँ, मदीना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है
मज़ार-ए-फ़ातिमा पे कर्बला वालों की याद आए,
मदीने वाले आका का घराना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है
नबी के ज़िक्र की महफ़िल में आते ही मुझे मोहसिन,
मदीना याद आता था, मदीना याद आता है,
मदीना याद आता है, मदीना याद आता है
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यह नात-ए-पाक हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के मुक़द्दस शहर मदीना मुनव्वरा की याद और वहाँ गुज़ारे हुए रूहानी लम्हों के बारे में है, जिसमें एक आशिक़-ए-रसूल का दिल मदीने की जुदाई में तड़प रहा है।
इस कलाम का अर्थ है कि शायर को मदीना शरीफ़ की पावन चौखट पर बैठकर अपने दिल का हाल सुनाना और गुम्बद-ए-ख़ज़रा के साये में रोना बहुत याद आता है। वह कहता है कि रसूलल्लाह ﷺ की मोहब्बत में दिन-रात उनके दरबार में हाज़िरी देना और मज़ार-ए-फ़ातिमा पर कर्बला के शहीदों को याद करना दिल को तड़पा जाता है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Hindi / English Meaning) |
|---|---|
| दरे अक़दस | पवित्र चौखट / पावन दर (Sacred Door / Threshold) |
| हाल-ए-दिल | दिल की बात या अवस्था (State of the heart) |
| गुम्बदे ख़ज़रा | हुज़ूर ﷺ का हरा गुम्बद (Green Dome) |
| रोज़-शब | दिन और रात / हर समय (Day and Night) |
| औवेस क़रनी | हज़रत उवैस क़रनी (एक महान आशिक़-ए-रसूल) |
| इजाज़त | अनुमति / आज्ञा (Permission) |
| मज़ार-ए-फ़ातिमा | सैयदा फ़ातिमा ज़हरा का रौज़ा (Shrine of Hazrat Fatima) |
| मोहसिन | शायर का उपनाम / तख़ल्लुस (Pen name of the poet) |
मदीना मुनव्वरा हर मोमिन के दिल का सुकून है, जहाँ की जुदाई आशिक़ों को बेचैन रखती है। इस नात में हज़रत उवैस क़रनी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का अपनी माँ से मदीने जाने की इजाज़त माँगने का वाक़्या और ज़िक्र-ए-नबी की महफ़िल में मदीने की याद तरोताज़ा होने की बात को शायर 'मोहसिन' ने बेहद भावुक अंदाज़ में पिरोया है।
इस नात में किस अज़ीम सहाबी का ज़िक्र किया गया है जो अपनी माँ से मदीने जाने की इजाज़त माँग रहे हैं?