मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ले के सब रहमतें ले के सब बरकतें माहे रमज़ान चला अलविदा अलविदा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : फरहान दिल मालेगांव
नातख्वान/कलाकार: अब्दुल हसीब बनारसी
जोड़ा गया : 20 Apr, 2023 10:48 AM IST
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अलविदा! अलविदा! अलविदा! अलविदा!
अलविदा! अलविदा! अलविदा! अलविदा!
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा,
अश्क मोमिन की आँखों से बहने लगे,
और दिल रो दिया, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
हम गुनहगार हैं, हम ख़ता-कार हैं,
हम को मंज़ूर है, हम सज़ा-वार हैं,
हम से ता'ज़ीम तेरी नहीं हो सकी,
और तू चल दिया, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
जैसे रखने थे रोज़े, नहीं रख सके,
हम इबादत की लज़्ज़त नहीं चख सके,
मौक़ा अल्लाह ने जो दिया था हमें,
हम ने वो खो दिया, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
तेरे आने से रौनक़ जहाँ में हुई,
रौशनी इक ज़मीं-आसमाँ में हुई,
हम को जन्नत मिलेगी तेरे फ़ैज़ से,
शुक्रिया शुक्रिया, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
हम इबादत में आगे बढ़ न सके,
दिल लगा कर तरावीह पढ़ न सके,
हम नमाज़ों से ग़ाफ़िल रहे जान कर,
जुर्म हम से हुआ, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
तेरे दम से थी इफ़्तार की नेमतें,
वक़्त-ए-सहरी थी अनवार की नेमतें,
रहमतों की घटा छाई थी हर तरफ़,
हर तरफ़ नूर था, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
कितने लोगों ने क़ुरआन पूरा पढ़ा,
सच्चा मोमिन तो जन्नत की सीढ़ी चढ़ा,
जिस ने जितनी इबादत की अल्लाह की,
उतना आगे बढ़ा, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
हम तो मसरूफ़ दुनिया के कामों में हैं,
फिर भी हम मुस्तफ़ा के ग़ुलामों में हैं,
हम तो रोज़े का भी कर न पाए लिहाज़,
थी हमारी ख़ता, अलविदा अलविदा
ले के सब रहमतें, ले के सब बरकतें,
माहे रमज़ान चला, अलविदा अलविदा
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यह रमज़ान के पवित्र महीने की विदाई पर गाया जाने वाला एक अत्यंत भावुक और मर्मस्पर्शी विदाई गीत (अलविदा कलाम) है। इसमें रमज़ान के गुज़रने पर मुसलमानों के दुःख और अपनी कमियों पर पछतावे को बयाँ किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि बरकतों और रहमतों से भरा हुआ रमज़ान का पवित्र महीना अब विदा हो रहा है, जिससे मोमिनों (विश्वासियों) का दिल रो पड़ा है और आँखों से आँसू (अश्क) बह रहे हैं। भक्त अपने गुनाहों को स्वीकार करते हुए कहता है कि हम दुनिया के कामों में व्यस्त रहने के कारण इस महीने का वैसा आदर (ताज़ीम) नहीं कर सके जैसा हमें करना चाहिए था।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| माहे रमज़ान | रमज़ान का महीना |
| अश्क | आँसू |
| ख़ता-कार / सज़ा-वार | ग़लती करने वाला / सज़ा के योग्य |
| ता'ज़ीम | आदर या सम्मान |
| लज़्ज़त | आनंद या स्वाद (यहाँ इबादत का आध्यात्मिक आनंद) |
| फ़ैज़ | कृपा, लाभ या बरकत |
| ग़ाफ़िल | लापरवाह या बेख़बर |
| अनवार | नूरानी चमक या दिव्य प्रकाश (नूर का बहुवचन) |
इस विदाई कलाम का मुख्य सार यह है कि रमज़ान के आने से पृथ्वी और आकाश में जो आध्यात्मिक रौनक़ और सहरी व इफ़्तारी की नेमतें मौजूद थीं, वे अब हमसे जुदा हो रही हैं। जहाँ सच्चे मोमिन इस महीने में रात-दिन इबादत और क़ुरआन पढ़कर जन्नत की सीढ़ियाँ चढ़ गए, वहीं कवि अपनी सुस्ती, छूटी हुई नमाज़ों और तरावीह में दिल न लगा पाने पर शर्मिंदा है। अंत में, वह अल्लाह का शुक्रिया अदा करता है कि इस महीने के फ़ैज़ और प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (मुस्तफ़ा ﷺ) की ग़ुलामी के सदके गुनहगारों को भी जन्नत नसीब होगी।
लिरिक्स के मुताबिक, सहरी के वक़्त किस चीज़ की नेमतें मयस्सर थीं (मिलती थीं)?