اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : कैसन वो तैबा दयार है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अली हैदर फ़ैज़ी लखनपुरी
नातख्वान/कलाकार: अली हैदर फ़ैज़ी लखनपुरी
जोड़ा गया : 07 Sep, 2025 09:16 AM IST
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कैसन वो तैबा दयार है,
देखन को दिल बेक़रार है।
जग-जग के नैना मोरे तरसे हैं,
सावन के बादल जैसा बरसे हैं।
जियत में जीना बेकरार है,
आका का कब दीदार है।
हसरत है, ग़ुर्बत है, मजबूरी है,
कैसे पहुँचूं कि इतनी दूरी है।
नैया जीवन की मझधार है,
मौला करे तो बेड़ा पार है।
कैसन वो तैबा दयार है,
जियत में जीना बेकरार है।
कैसन वो तैबा दयार है,
देखन को दिल बेक़रार है।
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यह नात एक भक्त की मदीना (तैबा) पहुँचने की तड़प और उसकी विवशता को भोजपुरी मिश्रित उर्दू में बड़े ही मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है। इसमें दूरी और गरीबी के बीच अटके एक प्रेमी के दर्द को दिखाया गया है।
कवि अपनी व्याकुलता व्यक्त करते हुए कहता है कि वह पवित्र मदीना शहर कैसा होगा जिसे देखने के लिए मेरा दिल हर पल तड़पता है। मेरी आँखें सावन की घटाओं की तरह रो रही हैं क्योंकि गरीबी और मजबूरी के कारण मैं अपने आका ﷺ के दरबार से बहुत दूर हूँ।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कैसन | कैसा (How/What kind) |
| दयाल/दयाल | स्थान या नगरी (Place/City) |
| जियत | जीते जी (While living) |
| ग़ुर्बत | गरीबी (Poverty) |
| हसरत | अधूरी इच्छा (Longing) |
| मझधार | लहरों के बीच (Middle of the stream) |
| बेड़ा पार | बेड़ा पार होना / उद्धार होना |
| दीदार | दर्शन (Seeing) |
इस कलाम का सार यह है कि मदीना की याद में कवि की रातें जागते हुए कट रही हैं और वह अपनी मजबूरी के कारण बहुत दुखी है। वह अपनी ज़िंदगी को एक ऐसी नाव मानता है जो मुश्किलों के समुद्र में फंसी है, और उसे पूरा विश्वास है कि केवल ईश्वर (मौला) की कृपा ही उसे मंज़िल तक पहुँचा सकती है।
"नैया जीवन की मझधार है, मौला करे तो बेड़ा पार है"—क्या यह पंक्ति हमें यह नहीं सिखाती कि जब दुनिया के सारे रास्ते बंद हो जाएँ, तब भी ईश्वर पर भरोसा बनाए रखना चाहिए?