मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : जो हो चुका है जो होगा हज़ूर जानते हैं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : ओवैस रज़ा कादरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 24 Mar, 2024 02:31 AM IST
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जो हो चुका है, जो होगा हज़ूर जानते हैं,
तेरी आता़ से ख़ुदाया हज़ूर जानते हैं।
ख़ुदा को देखा नहीं और एक मान लिया,
कि जानते थे सहाबा हज़ूर जानते हैं।
मुनाफ़िक़ून का अकीदा वो ग़ैबदाँ नहीं,
और सहाबियों का अकीदा हज़ूर जानते हैं।
ऐ इल्म-ए-ग़ैब के मुनकिर! ख़ुदा को देखा है?
और तुझे भी कहना पड़ेगा हज़ूर जानते हैं।
ख़बर भी है? कि खबर सबकी है उन्हें कब से
कि जब न अब था न कब था हज़ूर जानते हैं।
कि उनके हाथ में क्या-क्या तुझे खबर न मुझे,
ख़ुदा ने कितना नवाज़ा हज़ूर जानते हैं।
वो मोमिनों की तो जानों से भी क़रीब हुए,
कहाँ से किसने पुकारा हज़ूर जानते हैं।
इसलिए तो सुलाया है अपने पहलू में,
कि यार-ए-घर का रुतबा हज़ूर जानते हैं।
उमर ने तन से जुदा कर दिया था सर जिसका,
वो अपना है कि पराया हज़ूर जानते हैं।
नबी का फैसला न मानकर वो जान से गया,
मिज़ाज-ए-उमर कैसा हज़ूर जानते हैं।
वही हैं पैकर-ए-शर्म-ओ-हया वो ज़ुन-नूरैन,
मक़ाम उनकी हया का हज़ूर जानते हैं।
हैं जिसके मौला हज़ूर उसके हैं अली मौला,
अबू-तराब का रुतबा हज़ूर जानते हैं।
ये ख़ुद शहीद हैं बेटे, नवासे, पोते शहीद,
अली की शान-ए-यगाना हज़ूर जानते हैं।
मैं उनकी बात करूँ ये नहीं मेरी औक़ात,
कि शान-ए-फ़ातिमा ज़हरा हज़ूर जानते हैं।
जिना में कौन हैं सरदार नौजवानों के
हसन, हुसैन के नाना हज़ूर जानते हैं।
मलाइका ने किया यूँ जो सज्दा आदम को,
दरअसल किसको था सज्दा हज़ूर जानते हैं।
कहाँ मरेंगे अबू जहल, उतबा और शैबा?
कि जंगे-बद्र का नक़्शा हज़ूर जानते हैं।
वो कितना फ़ासला था, और कलाम था कैसा
आओ अَدना, और मा अ'ऊहा हज़ूर जानते हैं।
मिले थे राह में नौ बार किस लिए मूसा
ये दीद-ए-हक़ का बहाना हज़ूर जानते हैं।
मैं चुप खड़ा हूँ मवाजहा पे सर झुकाए हुए,
सुनाऊँ कैसे फ़साना हज़ूर जानते हैं।
छुपा रहे हैं लगातार मेरे ऐबों को
मैं किस क़दर हूँ कमीना हज़ूर जानते हैं।
ख़ुदा ही जाने उबैद! उनको है पता क्या-क्या,
हमें पता है बस इतना हज़ूर जानते हैं।
नहीं है ज़ाद-ए-सफ़र पास जिन ग़ुलामों के,
उन्हें भी दर पे बुलाना हज़ूर जानते हैं।
हिरन ने, ऊँट ने, चिड़ियों ने की यही फ़रियाद
कि इनके ग़म का मदावा हज़ूर जानते हैं।
तेरी आता़ से ख़ुदाया हज़ूर जानते हैं।
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यह कलाम अल्लाह की अता से नबी-ए-करीम ﷺ को मिलने वाले इल्म (ज्ञान) और उनकी रूहानी अज़मत को बयान करता है। इसमें बताया गया है कि हुज़ूर ﷺ कायनात के हर राज़, अपने सहाबा के मकाम और अपने गुलामों के हाल से बखूबी वाकिफ हैं।
शायर कहता है कि दुनिया में जो कुछ बीत चुका है और जो होने वाला है, अल्लाह के दिए हुए इल्म से हुज़ूर ﷺ उन सबका ज्ञान रखते हैं। चाहे वह जंग-ए-बद्र का नतीजा हो, मेराज का सफर हो या किसी बेज़बान जानवर की फरियाद—आप ﷺ सबकी खबर रखते हैं और अपने गुनहगार गुलामों के ऐबों (बुराइयों) पर पर्दा डालते हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अता (Ata) | अल्लाह की देन / उपहार |
| मुनाफ़िक़ून | कपटी लोग (दिखावे के मुस्लिम) |
| ग़ैबदाँ | परोक्ष (छिपी हुई बातों) को जानने वाला |
| मुनकिर | इनकार करने वाला |
| यार-ए-ग़ार | गुफा का साथी (हज़रत अबू बक्र सिद्दीक र.अ.) |
| पैकर-ए-शर्म | शर्म व हया की मूरत (हज़रत उस्मान र.अ.) |
| अबू-तराब | मिट्टी का बाप (हज़रत अली र.अ. की उपाधि) |
| मदावा | इलाज या समाधान |
इस नात का सार यह है कि पैगंबर मोहम्मद ﷺ को अल्लाह ने वह रूहानी ताकत और इल्म बख्शा है जिससे वे दिलों के हाल और कायनात की गुप्त बातों को जानते हैं। यह कलाम अक़ीदत (श्रद्धा) और विश्वास का इज़हार है कि एक मोमिन को जब भी ज़रूरत पड़ती है, उसके आका ﷺ उसकी पुकार सुनते हैं और उसकी मुश्किलों का हल जानते हैं।
नात के आखिर में शायर ने बीबी फातिमा ज़हरा (र.अ.) की शान के बारे में अपनी "औकात" का ज़िक्र किस तरह किया है, और उनकी शान की हकीकत के बारे में क्या कहा है?