मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : आई लव यू आक़ा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : असद इक़बाल कलकत्तावी
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी
जोड़ा गया : 19 Feb, 2023 01:40 PM IST
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आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा के आशिक़ का है एक नारा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
प्यारे रज़ा ने यहीं है सिखाया
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
दुनिया के रिश्तों ने जब मुँह को मोड़ा
जब बीच मझदार में सब ने छोड़ा
उस दम बिलाली लबों पे ये आया
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा के आशिक़ का है एक नारा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा ने चश्मे-करम जब उठाया
फ़ारूक़ी नफ़रत ने दम तोड़ डाला
फिर तो उमर के लबों से ये निकला
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा के आशिक़ का है एक नारा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा के आशिक़ की ऐ दुनिया वालो
खंज़र से चाहे ज़बां काट डालो
दिल की ज़बां से वो केहता रहेगा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा के आशिक़ का है एक नारा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आफ़त मुसीबत ने जब भी रुलाया
दुनियां ने जिस वक्त मुझ को सताया
उस वक़्त दिल ने तड़प कर पुकारा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ागिफ्ट बास्केट
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
आक़ा के आशिक़ का है एक नारा
आई लव यू आक़ा, आई लव यू आक़ा
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यह नात-ए-पाक आधुनिक और सरल अंदाज़ में हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के प्रति एक सच्चे आशिक़ की असीम और अटूट मोहब्बत को बयां करती है। इसमें इतिहास के महान किरदारों का हवाला देते हुए समझाया गया है कि नबी ﷺ की चाहत ही हर मोमिन की असली ताक़त है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि "जब संसार के सारे झूठे रिश्ते-नाते संकट के समय साथ छोड़ देते हैं, तब केवल मेरे आक़ा ﷺ का नाम ही बेसहारा दिल को ढांढस बंधाता है।" शायर कहता है कि एक सच्चे आशिक़-ए-रसूल को चाहे जितना डराया जाए या ज़ुल्म की तलवार से उसकी ज़बान काट दी जाए, फिर भी उसके दिल की हर धड़कन से यही आवाज़ गूँजेगी कि "हे मेरे आक़ा ﷺ! मैं आपसे बेहद प्यार करता हूँ।"
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| आक़ा | स्वामी या मालिक (यहाँ मुराद हुज़ूर ﷺ से है) |
| प्यारे रज़ा | आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान (प्रसिद्ध सूफ़ी संत) |
| मझदार | बीच धारा में / मुश्किल हालातों के बीच |
| बिलाली लब | हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ि.) के होंठ (जो ज़ुल्म सहकर भी 'अहद' पुकारते थे) |
| चश्मे-करम | कृपा, दया या करुणा की दृष्टि |
| फ़ारूक़ी नफ़रत | इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व हज़रत उमर (फ़ारूक़-ए-आज़म) का गुस्सा |
| आफ़त / मुसीबत | संकट, विपदा या घोर दुःख |
इस कलाम का मूल सार यह है कि पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की मोहब्बत ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। नात में ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया गया है कि जब नबी ﷺ ने अपनी दया की नज़र (चश्मे-करम) उठाई, तो हज़रत उमर का पुराना गुस्सा और नफ़रत पल भर में पिघलकर अटूट प्रेम में बदल गई। जीवन में जब भी कोई सांसारिक संकट आता है या दुनिया सताती है, तो एक मोमिन का दिल तड़पकर अपने आक़ा ﷺ को ही याद करता है, क्योंकि आला हज़रत (प्यारे रज़ा) ने भी उम्मत को केवल अपने नबी ﷺ से वफ़ादारी और बेइंतहा मोहब्बत करना ही सिखाया है।
लिरिक्स के मुताबिक, नबी ﷺ के चश्मे करम (कृपा की नज़र) उठाने से फ़ारूक़ी नफ़रत पर क्या असर पड़ा?