मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : होगा एक जलसा हश्र में ऐसा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हबीबुल्लाह फ़ैज़ी
नातख्वान/कलाकार: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी
जोड़ा गया : 19 Mar, 2023 12:59 PM IST
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होगा एक जलसा हश्र में ऐसा
जिसमें सरकार की अज़मत पे ख़िताबत होगी
सद्रे महशर हमारा रब होगा
हज़रत-ए बुलबुल-ए सिदरा की नेक़ाबत होगी
होगा सर मुस्तफा का सज्दे में
जब परेशानी के आलम में ये उम्मत होगी
रब कहेगा ये मेरा वादा
उसको बख्शूंगा तेरी जिस में मोहब्बत होगी
होगा एक जलसा हश्र में ऐसा
जिसमें सरकार की अज़मत पे ख़िताबत होगी
मैं पढ़ूंगा हिदायत-ए बख्शी
जल्सा-ए हश्र में अगर मुझको इजाज़त होगी
सुन के नारा लगाएंगे सुन्नी
और वहाबी के लिए दोहरी क़यामत होगी
ये वसीयत है एक मुजद्दिद की
कद की मिक़दार में गहरी मेरी तुर्बत होगी
उठ सकूं मैं पाए अदब फ़ौरन
जिस घड़ी क़ब्र में आका की ज़ियारत होगी
आलाहज़रत बुलाए जाएंगे
जब वहाँ हिंद के हसन की हाजत होगी
तू है एक रज़वी नातख़्वां 'फ़ैज़ी'
इसलिए तेरी भी उस जलसे में दावत होगी
होगा एक जलसा हश्र में ऐसा
जिसमें सरकार की अज़मत पे ख़िताबत होगी
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यह अक़ीदत और बेहद जोश से भरी एक सुप्रसिद्ध सुन्नी मनक़बत है, जो आलाहज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान के मसलक और अफ़कार के रंग में डूबी हुई है। इसमें प्रलय (क़यामत) के दिन हुज़ूर ﷺ की महानता, उनकी शफ़ाअत (सिफ़ारिश) और उनके सच्चे चाहने वालों की कामयाबी को एक भव्य जलसे (सभा) के रूप में दर्शाया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि क़यामत के मैदान (हश्र) में अल्लाह की अदालत एक महान जलसे की तरह सजेगी, जहाँ का मुख्य न्यायधीश (सद्र) स्वयं ईश्वर होगा और हज़रत जिब्रील (बुलबुल-ए-सिदरा) उद्घोषक (नाक़िब) होंगे। जब पूरी उम्मत पापों के कारण घबराहट और परेशानी में होगी, तब प्यारे नबी ﷺ अल्लाह के सामने सज्दे में गिरकर अपनी उम्मत की माफ़ी मांगेंगे; तब अल्लाह वादा करेगा कि "हे महबूब, जिसके दिल में भी आपकी सच्ची मोहब्बत होगी, मैं उसे बख़्श (माफ़ कर) दूँगा।"
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| हश्र / महशर | प्रलय का दिन / क़यामत का मैदान |
| अज़मत / ख़िताबत | महानता या गौरव / भाषण या सम्बोधन |
| बुलबुल-ए-सिदरा | सिदरतुल मुन्तहा के पक्षी (यहाँ तात्पर्य हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम से है) |
| नेक़ाबत | मंच संचालन / जलसे की निज़ामत |
| तुर्बत / पाए अदब | क़ब्र / सम्मान और आदर के साथ पैरों पर खड़े होना |
| हिंद के हसन | भारत के हसन (यहाँ मुराद आलाहज़रत से है, जिनकी नातिया शायरी हज़रत हसन बिन साबित की तरह बेमिसाल है) |
| हाजत / ज़ियारत | आवश्यकता या ज़रूरत / दर्शन या दीदार |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि हश्र के दिन केवल नबी ﷺ के प्रति सच्ची निष्ठा और प्रेम रखने वाले ही सफ़ल होंगे, जबकि उनके विरोधियों के लिए वह दिन दोहरा कष्ट लेकर आएगा। शायर एक महान युग-प्रवर्तक (मुजद्दिद यानी आलाहज़रत) की वसीयत का ज़िक्र करता है कि उनकी क़ब्र को गहरी (उनकी लंबाई के बराबर) खोदा जाए, ताकि जब क़ब्र में आक़ा ﷺ के दर्शन (ज़ियारत) हों, तो वह अदब के साथ तुरंत खड़े हो सकें। अंत में नातख़्वां 'फ़ैज़ी' को सांत्वना दी गई है कि हुज़ूर ﷺ के वफ़ादार होने के नाते उस ईश्वरीय जलसे में उनका भी स्वागत होगा।
लिरिक्स के मुताबिक, हशर के जलसे में नबी ﷺ किस हाल में होंगे जब उम्मत परेशानी में होगी, और अल्लाह किसको बख्शने (माफ करने) का वादा करेगा?