मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : हर नज़र काँप उठेगी महशर के दिन ख़ौफ़ से हर कलेजा दहल जाएगा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 05 Aug, 2023 09:48 AM IST
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हर नज़र काँप उठेगी महशर के दिन,
ख़ौफ़ से हर कलेजा दहल जाएगा।
जब इशारा करेंगे मेरे मुस्तफ़ा,
अपना बेड़ा भँवर से निकल जाएगा।
पर ये नाज़ उनके बंदे का देखेंगे सब,
थाम कर उनका दामन मचल जाएगा।
यूँ तो जीता हूँ हुक्मे-ख़ुदा से मगर,
मेरे दिल की है उनको यक़ीनन ख़बर।
हासिले ज़िंदगी होगा वो दिन मेरा,
उनके क़दमों में जब दम निकल जाएगा।
जब इशारा करेंगे मेरे मुस्तफ़ा,
अपना बेड़ा भँवर से निकल जाएगा।
मौज टकरा के हमसे गुज़र जाएगी,
रुख़ मुख़ालिफ़ हवा का बदल जाएगा।
हासिले ज़िंदगी होगा वो दिन मेरा,
उनके क़दमों में जब दम निकल जाएगा।
जब इशारा करेंगे मेरे मुस्तफ़ा,
अपना बेड़ा भँवर से निकल जाएगा।
रब्बे सल्लिम वो फ़रमाने वाले मिले,
क्यों सताते हैं ऐ दिल तुझे वसवसे?
पुल से गुज़रेंगे हम वज्द करते हुए,
कौन कहता है पाँव फिसल जाएगा।
जब इशारा करेंगे मेरे मुस्तफ़ा,
अपना बेड़ा भँवर से निकल जाएगा।
अख़्तर-ए-ख़स्ता क्यों इतना बेचैन है,
तेरा आका शहंशाह-ए-कौनैन है।
लाओ लगा तो सही शाह-ए-लौलाक से,
ग़म मसर्रत के सांचे में ढल जाएगा।
जब इशारा करेंगे मेरे मुस्तफ़ा,
अपना बेड़ा भँवर से निकल जाएगा।
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यह सुप्रसिद्ध नात-ए-पाक प्रलय के दिन (महशर) की भयावहता और उस कठिन समय में हुज़ूर पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की दयालुता व उनकी शफ़ाअत (सहायता) पर अटूट विश्वास को बयां करती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि प्रलय (महशर) के दिन जब हर इंसान डर से काँप रहा होगा, उस समय यदि हमारे आक़ा मुस्तफ़ा ﷺ ने एक इशारा कर दिया, तो हमारी संकटों में फँसी नैया पार हो जाएगी। शायर कहता है कि उनके 'रब्बे-सल्लिम' (ऐ रब! इन्हें सलामत रख) के नारे की बदौलत हम पुल-ए-सिरात से भी रूहानी मस्ती में झूमते हुए पार हो जाएँगे और हमारा पाँव कभी नहीं फिसलेगा।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| महशर | प्रलय / न्याय का दिन |
| बेड़ा | नाव / कश्ती |
| हासिले ज़िंदगी | जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि या सफ़लता |
| रुख़ मुख़ालिफ़ | विपरीत दिशा / उल्टी हवा |
| वसवसे | मन का वहम, शक या बुरी सोच |
| वज्द | रूहानी मस्ती / ईश्वरीय प्रेम में झूमना |
| अख़्तर-ए-ख़स्ता | दुखी या परेशान-हाल अख़्तर (शायर का नाम) |
| शहंशाह-ए-कौनैन | दोनों जहानों के राजा (हुज़ूर ﷺ) |
| मसर्रत | प्रसन्नता / ख़ुशी |
इस कलाम का मुख्य संदेश यह है कि एक मोमिन को अपनी परलोक की मंज़िल से डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे मार्गदर्शक स्वयं हुज़ूर ﷺ हैं। शायर 'अख़्तर' कहते हैं कि यदि हम सच्चे मन से सृष्टि के स्वामी (शाह-ए-लौलाक) से लौ लगा लें, तो हमारे सारे दुःख सुख में बदल जाएँगे; और जीवन की सबसे बड़ी जीत यही होगी कि हमारी मृत्यु मदीने में उनके पवित्र क़दमों के पास आए।
लिरिक्स के मुताबिक शायर 'अख़्तर' ने नबी के क़दमों में दम निकलने (मौत आने) को क्या बताया है?