मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
जोड़ा गया : 07 Jan, 2023 01:16 PM IST
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हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो,
हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो,
काबा तो देख चुके काबे का काबा देखो
आबे ज़म ज़म तो पिया खूब भुजाई प्यासे,
आबे ज़म ज़म तो पिया खूब भुजाई प्यासे,
आओ जूदे शाह-ए-कौसर का भी जलवा देखो
हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो
खूब आंखो से लगाया गिलफ़े काबा,
खूब आंखो से लगाया गिलफ़े काबा,
कसरे महबूब के परदे का भी जलवा देखो
हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो
ज़ीनते काबा मे था लाख उरुसो का बनाओ,
ज़ीनते काबा मे था लाख उरुसो का बनाओ,
जलवा फरमा यहा कौनेन का दूल्हा देखो
हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो
ज़ेरे मिज़ाब मिले खून कर्म के छींटे,
ज़ेरे मिज़ाब मिले खून कर्म के छींटे,
आबरे रहमत का यहा जोर बरसना देखो
हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो
गौर से सुन तो रज़ा काबे से आती है सदा,
गौर से सुन तो रज़ा काबे से आती है सदा,
मेरी आँखों से मेरे प्यारे का रोज़ा देखो
हाजियों आओ शाहेनशाह का रोज़ा देखो
काबा तो देख चुके काबे का काबा देखो
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यह मशहूर नात-ए-पाक आला हजरत इमाम अहमद रजा खान बरेलवी की लिखी हुई है, जिसमें उन्होंने हज करने वालों से मुखातिब होकर काबा शरीफ के बाद रोजा-ए-रसूल ﷺ की जियारत की अहमियत और उनकी बुलंद शान का बयान किया है।
इस कलाम का मतलब है कि ऐ हाजियों, तुमने अल्लाह का घर (काबा) तो देख लिया, अब उस मुकद्दस हस्ती का दरबार (रोजा-ए-रसूल ﷺ) भी देखो जो खुद काबे का भी काबा हैं। शायर कहता है कि अगर काबा लाखों दुल्हनों की तरह सजा हुआ है, तो मदीना वह पाक जगह है जहां दोनों जहान के दूल्हे (हुजूर ﷺ) तशरीफ फरमा हैं।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| शाहेनशाह (Shahenshah) | बादशाहों का बादशाह / हुजूर ﷺ |
| रोज़ा (Roza) | मज़ार-ए-मुबारक (Tomb/Shrine) |
| जूदे शाह-ए-कौसर (Joode Shah-e-Kausar) | हौज-ए-कौसर के मालिक की सखावत/दानशीलता |
| गिलाफे काबा (Gilafe Kaba) | काबा का पर्दा/कवर (Covering of Kaba) |
| कसरे महबूब (Kasre Mehboob) | महबूब (हुजूर ﷺ) का महल |
| उरुसो (Uruso) | दुल्हनें (Brides) |
| कौनेन का दूल्हा (Kaunen Ka Dulha) | दोनों जहान के दूल्हे (हुजूर ﷺ) |
| ज़ेरे मिज़ाब (Zayre Mizab) | काबा के परनाले (धारे) के नीचे |
| आबरे रहमत (Abre Rehmat) | दया/रहमत का बादल |
| सदा (Sada) | आवाज़ (Voice) |
शायर 'रज़ा' फरमाते हैं कि हज का सफर तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक मदीने जाकर रोजा-ए-अनवर का दीदार न किया जाए। खुद काबा भी हाजियों से पुकार-पुकार कर कह रहा है कि मेरी रौनक और अजमत भी हुजूर ﷺ के नूर से है, इसलिए मेरी आँखों से उनके हसीन रोजे का जलवा देखो जहां अल्लाह की रहमत हर वक्त बरसती रहती है।
शायर के मुताबिक काबे से क्या आवाज़ (सदा) आ रही है, और उन्होंने "कौनैन का दूल्हा" किसके लिए इस्तेमाल किया है?