मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 01 Aug, 2023 06:11 PM IST
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एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है,
जो रब्बे दो आलम का महबूब यगाना है।
कल पुल से हमें जिसने ख़ुद पार लगाना है,
ज़हरा का वो बाबा है, हसनैन का नाना है।
एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
आओ दर-ए-ज़हरा पर फैलाए हुए दामन,
है नस्ल करीमों की लाजपाल घराना है।
एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
इज़्ज़त से क्यों मर जाए हम नाम-ए-मोहम्मद पर,
यूँ भी किसी दिन हमको दुनिया से तो जाना है।
एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
महरूम-ए-करम इसको रखना न सारे महशर,
जैसा है नसीर आखिर साइल तो पुराना है।
एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है,
जो रब्बे दो आलम का महबूब यगाना है।
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यह अत्यंत प्रसिद्ध और भावपूर्ण नात-ए-पाक (पीर नसीरुद्दीन नसीर द्वारा रचित) हुज़ूर पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की बारगाह में श्रद्धा सुमन अर्पित करती है, जिसमें उनकी शफ़ाअत (सहायता) और उनके पावन घराने की उदारता का सुंदर वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि केवल मैं ही नहीं, बल्कि संपूर्ण संसार मेरे नबी ﷺ के प्रेम पर न्योछावर है, जो दोनों जहानों के पालनहार के सबसे प्रिय और अनूठे महबूब हैं। शायर कहता है कि कल प्रलय (क़यामत) के दिन जो हमें पुल-सिरात की कठिन राह से खुद पार लगाएंगे, वे कोई और नहीं बल्कि बीवी फ़ातिमा ज़हरा के पूज्य पिता और हसन व हुसैन (हसनैन) के नाना जान हैं।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| यगाना | अनोखा / अद्वितीय (लाजवाब) |
| पुल | पुल-सिरात (क़यामत का एक कठिन मार्ग) |
| दर-ए-ज़हरा | बीवी फ़ातिमा की चौखट |
| लाजपाल | सम्मान की रक्षा करने वाला / अत्यंत दयालु |
| महरूम-ए-करम | कृपा से वंचित / महरूम |
| सारे महशर | क़यामत के मैदान में |
| साइल | याचक / सवाली या मँगता |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि नबी-ए-करीम ﷺ और उनका पवित्र परिवार (अहले बैत) अत्यंत दयावान और दानी है, जिनके दर से कोई भी सवाली ख़ाली हाथ नहीं लौटता। शायर नबी ﷺ के नाम पर अपने प्राणों की आहुति देने को सबसे बड़ा गौरव मानता है, क्योंकि मृत्यु तो एक दिन आनी ही है। अंत में शायर 'नसीर' प्रार्थना करते हैं कि हे आक़ा, न्याय के दिन मुझे अपनी दया से दूर न रखना, क्योंकि मैं जैसा भी हूँ, आपका एक पुराना मँगता हूँ।
लिरिक्स के मुताबिक, कल क़यामत के दिन हमें पुल-सिरात से कौन पार लगाएंगे?