मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : दिल ये बेचैन रहने लगा आज कल
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: अख्तर काशिफ़ अशफाक कादरी अलीमी
जोड़ा गया : 24 Sep, 2022 02:07 PM IST
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दिल ये बेचैन रहने लगा आज कल,
ये ना पूछो की इस दिल को क्या चाहिए
न दवा चाहिए न शिफा चाहिए,
रौज़ ए मुस्तफा की हवा चाहिए।
है मेरा पीर अख़्तर रज़ा अज़हरी,
जिनको कहते हैं ताजुश्शरिया सभी
हैं सभी अपनी जगह मोहतरम,
पर मुझे मेरा अख़्तर रज़ा चाहिए।
अपनी जन्नत के नज़दीक जाया करो,
पांव मां बाप के तुम दबाया करो
अपने मां बाप को ना सताया करो,
गर तुम अपने अपने रब की रज़ा चाहिए।
दिल ये कहता हैं आएंगे आएंगे वो,
अपनी सूरत मुझे भी दिखाएंगे वो
देखना हो अगर रुए खैरुल वारा,
लब पे हर वक्त सल्ले अला चाहिए।
शायरी भी ऐ काशिफ निखर जाएगी,
आखिरत भी यक़ीनन संवर जाएगी
इश्क़े हस्सान दिलों में पैदा करो,
साथ में फ़िकरे अहमद रज़ा चाहिए।
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यह भावपूर्ण नात और मन्क़बत मदीना शरीफ़ की तड़प, माता-पिता की सेवा का महत्व, और अपने गुरु (मुर्शिद) के प्रति सच्ची श्रद्धा का एक बहुत ही सुंदर और शिक्षाप्रद वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि आाशिकाना दिल मदीना की याद में हर पल व्याकुल रहता है; उसे सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए कोई दवा या इलाज (शिफ़ा) नहीं, बल्कि सिर्फ़ हुज़ूर ﷺ के पवित्र रौज़े की ठंडी और रूहानी हवा चाहिए। कवि का मानना है कि यदि कोई ईश्वर (रब) की प्रसन्नता चाहता है, तो उसे अपनी जन्नत यानी अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए और उन्हें कभी दुखाना नहीं चाहिए।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| शिफ़ा | बीमारी से मुक्ति / स्वास्थ्य लाभ |
| मोहतरम | आदरणीय / सम्मानित |
| रज़ा | इच्छा / प्रसन्नता या मर्ज़ी |
| रुए खैरुल वारा | सबसे उत्तम सृष्टि (हुज़ूर ﷺ) का पवित्र मुखड़ा |
| सल्ले अला | हुज़ूर ﷺ पर पढ़ा जाने वाला दरूद शरीफ़ |
| आख़िरत | परलोक / मृत्यु के बाद का जीवन |
कवि कहता है कि यदि आपके दिल में पैगंबर ﷺ (ख़ैरुल वारा) के दीदार की सच्ची चाह है, तो आपकी ज़ुबान पर हर समय दरूद शरीफ़ का वास होना चाहिए। कलाम में ताजुश्शरिया हज़रत अख़्तर रज़ा ख़ान के प्रति असीम प्रेम व्यक्त किया गया है। अंत में कवि 'काशिफ़' स्वयं को और दूसरों को नसीहत देता है कि अपनी कला (शायरी) और परलोक (आख़िरत) दोनों को सँवारने के लिए दिल में हज़रत हस्सान बिन साबित जैसा प्रेम और आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान जैसी इस्लामी सोच व फ़िक्र पैदा करनी होगी।
शायर के अनुसार, यदि कोई इंसान अपने रब (ईश्वर) की रज़ा और ख़ुशी चाहता है, तो उसे किसके पाँव दबाने चाहिए और उन्हें नहीं सताना चाहिए?