मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : दिल को उनसे खुदा जुदा न करे
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी नदीम रजा धेरमी नदीम रज़ा फ़ैज़ी ओवैस रज़ा कादरी सज्जाद निज़ामी (मरहूम) सलीम रज़ा पिलीभीति
जोड़ा गया : 10 Jun, 2023 01:57 PM IST
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दिल को उनसे खुदा जुदा न करे,
बे कसी लूट ले खुदा न करे
इस में रौज़े का सज्दा हो कि तवाफ़,
होश में जो न हो वोह क्या न करे
यह वही हैं के बख़्श देते हैं,
कौन इन जुर्मों पर सज़ा न करे
सब त़बीबों ने दे दिया है जवाब,
आह ई़सा अगर दवा न करे
दिल कहां ले चला ह़रम से मुझे,
अरे तेरा बुरा खुदा न करे
उ़ज़र् उम्मीदे अ़फ़्व गर न सुनें,
रु सियाह और क्या बहाना करे
दिल में रोशन है शम्ए़ इ़श्क़े हुज़ूर,
काश जोशे हवस हवा न करे
ह़श्र में हम भी सैर देखेंगे,
मुन्किर आज उनसे इल्तिजा न करे
ज़ो,फ़ माना मगर यह जा़लिम दिल,
उन के रस्ते में तो थका न करे
जब तेरी ख़ू है सब का जी रखना,
वही अच्छा जो दिल बुरा न करे
दिल से इक ज़ौक़े मै का त़ालिब हूं,
कौन कहता है इत्तिक़ा न करे
ले रज़ा सब चले मदीने को,
मैं न जाऊं अरे खुदा न करे
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यह आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी द्वारा रचित एक अत्यंत भावुक नात-ए-पाक है। इसमें मदीने की हाज़िरी की तड़प, नबी ﷺ की दयालुता और एक गुनहगार के अटूट विश्वास को दर्शाया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसका दिल कभी भी नबी ﷺ की याद से अलग न हो, क्योंकि उनके बिना वह बिल्कुल असहाय (बेकस) हो जाएगा। हुज़ूर ﷺ की आदत सबको माफ़ करने और सबका दिल रखने की है; इसलिए जब सारा संसार मदीने की ओर बढ़ रहा हो, तो रज़ा का पीछे छूट जाना नामुमकिन है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| बेकसी | लाचारी / अकेलापन |
| तबीब | हकीम / डॉक्टर या चिकित्सक |
| हरम | पवित्र स्थान (यहाँ मुराद मदीना शरीफ़ से है) |
| रु सियाह | काले मुँह वाला / पापी या गुनहगार |
| हश्र | कयामत का दिन / न्याय का दिन |
| मुन्किर | इनकार करने वाला / विरोधी |
| ज़ोफ़ | कमज़ोरी / शारीरिक शिथिलता |
इस नात का मुख्य सार यह है कि पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की दया और शफ़ाअत ही हर रूहानी और जिस्मानी बीमारी का असली इलाज है, जहाँ दुनिया के सारे हकीम हार मान जाते हैं। शायर अपने गुनाहों से शर्मिंदा (रु सियाह) है, लेकिन उसे पूरा विश्वास है कि हुज़ूर ﷺ बड़े से बड़े अपराधियों को भी क्षमा कर देते हैं। अंत में, आला हज़रत (रज़ा) मदीना जाने वाले काफ़िलों को देखकर तड़प उठते हैं और कहते हैं कि सब मदीने जा रहे हैं और मैं न जा पाऊँ, ऐसा ईश्वर कभी न करे।
लिरिक्स के आखिरी शेर में, आला हज़रत ने किस जगह न जाने के ख़्याल पर "अरे ख़ुदा न करे" कहा है?