मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : छोड़ फ़िक्र दुनिया की चल मदीने चलते हैं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: असद रज़ा अत्तारी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 09 Mar, 2026 07:22 AM IST
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छोड़ फ़िक्र दुनिया की, चल मदीने चलते हैं
मुस्तफ़ा ग़ुलामों की क़िस्मतें बदलते हैं
छोड़ फ़िक्र दुनिया की
रहमतों के बादल के साए साथ चलते हैं
मुस्तफ़ा के दीवानें घर से जब निकलते हैं
छोड़ फ़िक्र दुनिया की
हम को रोज़ मिलता है सदक़ा प्यारे आक़ा का
उन के दर के टुकड़ों पर ख़ुश-नसीब पलते है
छोड़ फ़िक्र दुनिया की
आमिना के प्यारे का, सब्ज़-गुंबद वाले का
जश्न हम मनाते हैं, जलने वाले जलते हैं
छोड़ फ़िक्र दुनिया की
सिर्फ़ सारी दुनिया में वो तयबा की गलियाँ हैं
जिस जगह पे हम जैसे खोटे सिक्के चलते हैं
छोड़ फ़िक्र दुनिया की
सच है ग़ैर का एहसाँ वो कभी नहीं लेते
ए अलीम! आक़ा के जो टुकड़ों पे पलते हैं
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यह नात-ए-पाक नबी (ﷺ) की अज़मत और मदीने की तड़प को बहुत ही सरल और प्रभावशाली ढंग से पेश करती है। इसमें भक्त की अटूट आस्था और ईश्वरीय कृपा का वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि दुनिया के दुखों की चिंता छोड़ कर मदीने की राह पकड़नी चाहिए, क्योंकि हुज़ूर (ﷺ) की चौखट पर पहुँचते ही नसीब बदल जाते हैं। कवि का मानना है कि जो लोग उनके प्रेम में समर्पित होते हैं, ईश्वर की दया (रहमत) हमेशा उनके साथ साये की तरह चलती है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मुस्तफ़ा | हज़रत मुहम्मद (ﷺ) का एक नाम (चुना हुआ) |
| सदक़ा | दान या कृपा स्वरूप मिलने वाली भेंट |
| तयबा | मदीना शहर का पवित्र नाम |
| खोटे सिक्के | बेकार या अयोग्य लोग (यहाँ विनम्रता के लिए उपयोग हुआ है) |
| ग़ैर | पराया या अन्य व्यक्ति |
| एहसाँ | उपकार (Favor) |
इस कलाम का सारांश यह है कि मदीना वह पावन स्थान है जहाँ अयोग्य और गुनहगार लोगों को भी सम्मान और पनाह मिलती है। जो लोग नबी (ﷺ) के दर से जुड़े हैं, वे दुनिया में किसी और के आगे हाथ नहीं फैलाते, क्योंकि उनका विश्वास है कि उनके आक़ा उनकी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए काफी हैं।
शायर ने मदीना की गलियों को ऐसा क्यों कहा है जहाँ "खोटे सिक्के" भी चलते हैं?