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छोड़ फ़िक्र दुनिया की चल मदीने चलते हैं Lyrics In हिन्दी

(छोड़ फ़िक्र दुनिया की चल मदीने चलते हैं, मुस्तफ़ा ग़ुलामों की क़िस्मतें बदलते हैं)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : छोड़ फ़िक्र दुनिया की चल मदीने चलते हैं

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

जोड़ा गया : 09 Mar, 2026 07:22 AM IST

बार देखा गया : 356

Time to read: 1 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

छोड़ फ़िक्र दुनिया की, चल मदीने चलते हैं
मुस्तफ़ा ग़ुलामों की क़िस्मतें बदलते हैं

छोड़ फ़िक्र दुनिया की

रहमतों के बादल के साए साथ चलते हैं
मुस्तफ़ा के दीवानें घर से जब निकलते हैं

छोड़ फ़िक्र दुनिया की

हम को रोज़ मिलता है सदक़ा प्यारे आक़ा का
उन के दर के टुकड़ों पर ख़ुश-नसीब पलते है

छोड़ फ़िक्र दुनिया की

आमिना के प्यारे का, सब्ज़-गुंबद वाले का
जश्न हम मनाते हैं, जलने वाले जलते हैं

छोड़ फ़िक्र दुनिया की

सिर्फ़ सारी दुनिया में वो तयबा की गलियाँ हैं
जिस जगह पे हम जैसे खोटे सिक्के चलते हैं

छोड़ फ़िक्र दुनिया की

सच है ग़ैर का एहसाँ वो कभी नहीं लेते
अलीम! आक़ा के जो टुकड़ों पे पलते हैं

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह नात-ए-पाक नबी (ﷺ) की अज़मत और मदीने की तड़प को बहुत ही सरल और प्रभावशाली ढंग से पेश करती है। इसमें भक्त की अटूट आस्था और ईश्वरीय कृपा का वर्णन है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि दुनिया के दुखों की चिंता छोड़ कर मदीने की राह पकड़नी चाहिए, क्योंकि हुज़ूर (ﷺ) की चौखट पर पहुँचते ही नसीब बदल जाते हैं। कवि का मानना है कि जो लोग उनके प्रेम में समर्पित होते हैं, ईश्वर की दया (रहमत) हमेशा उनके साथ साये की तरह चलती है।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
मुस्तफ़ाहज़रत मुहम्मद (ﷺ) का एक नाम (चुना हुआ)
सदक़ादान या कृपा स्वरूप मिलने वाली भेंट
तयबामदीना शहर का पवित्र नाम
खोटे सिक्केबेकार या अयोग्य लोग (यहाँ विनम्रता के लिए उपयोग हुआ है)
ग़ैरपराया या अन्य व्यक्ति
एहसाँउपकार (Favor)

सारांश (Summary)

इस कलाम का सारांश यह है कि मदीना वह पावन स्थान है जहाँ अयोग्य और गुनहगार लोगों को भी सम्मान और पनाह मिलती है। जो लोग नबी (ﷺ) के दर से जुड़े हैं, वे दुनिया में किसी और के आगे हाथ नहीं फैलाते, क्योंकि उनका विश्वास है कि उनके आक़ा उनकी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए काफी हैं।

शायर ने मदीना की गलियों को ऐसा क्यों कहा है जहाँ "खोटे सिक्के" भी चलते हैं?

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