मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : चांद बद्री से परदा हटाये दिया जाये अपना नूरानी चेहरा दिखाये दिया जाये
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हैदर परवाज़
नातख्वान/कलाकार: हैदर परवाज़
जोड़ा गया : 05 Oct, 2022 04:58 PM IST
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चांद बद्री से परदा हटाये दिया जाये
अपना नूरानी चेहरा दिखाये दिया जाये
तुम बिन आका जिया घबराये
रतिया रतिया नींद नहीं आये
अपने कदमों में हमका सुलआये लिया जाये
चांद बद्री से परदा हटाये दिया जाये
अपना नूरानी चेहरा दिखाये दिया जाये
जियारा तड़पे पिंजरे के अंदर
रस्ता नहीं है भरा है समन्दरी
कैसे आऊं मैं आका बताये दिया जाये
चांद बद्री से परदा हटाये दिया जाये
अपना नूरानी चेहरा दिखाये दिया जाये
हज की महिन्वा सातवत बहुत है
हाजिन की टोली रूलावत बहुत है
तनी हमहौका दर्शन कराये दिया जाये
चांद बद्री से परदा हटाये दिया जाये
अपना नूरानी चेहरा दिखाये दिया जाये
मेहशर में जब हमका गरमी सताये
प्यासन के मारे ज़बन्या सुखाये
अपना हाथो से कौसर पिलाये दिया जाये
चांद बद्री से परदा हटाये दिया जाये
अपना नूरानी चेहरा दिखाये दिया जाये
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यह बेहद खूबसूरत और अनोखी नात शरीफ़ अवधी-भोजपुरी मिश्रित लोकभाषा के लहजे में लिखी गई है, जो आक़ा हुज़ूर ﷺ के दीदार (दर्शन) की तड़प और मदीने की हाज़िरी के लिए एक भक्त के सीधे-सच्चे और गहरे आशियाना जज्बात को दर्शाती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि आक़ा के वियोग में भक्त का मन इतना व्याकुल है कि उसे रातों को नींद नहीं आती, इसलिए वह रो-रोकर प्रार्थना कर रहा है कि हुज़ूर अपने नूरानी चेहरे से बादलों रूपी पर्दा हटाकर उसे दर्शन दे दें। वह तड़पते हुए कहता है कि मेरा दिल इस शरीर रूपी पिंजरे में मदीना जाने के लिए छटपटा रहा है, पर बीच में दुखों का गहरा समंदर है, आक़ा स्वयं वहाँ आने का रास्ता दिखा दें।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| बद्री | बादल (यहाँ बादलों की ओट में छिपे चाँद से तुलना है) |
| रतिया | रातें / रात्रि |
| जियारा | हृदय / दिल या प्राण |
| हाजिन | हज यात्रा पर जाने वाले यात्री (हाजी) |
| तनी | थोड़ा सा / ज़रा सा |
| मेहशर | प्रलय (क़यामत) का मैदान |
भक्त अपनी बेबसी बयां करते हुए कहता है कि जब हज का महीना आता है और वह लोगों को मदीने जाते देखता है, तो हाजियों की टोली उसे बहुत रुलाती है। उसकी बस एक ही पुकार है कि उसे भी आक़ा के पवित्र चरणों का दर्शन नसीब हो जाए। अंत में वह दुआ करता है कि प्रलय (मेहशर) के दिन जब भीषण गर्मी में प्यास से ज़ुबान सूखने लगेगी, तब आक़ा कृपा करके अपने पावन हाथों से उसे 'हौज़-ए-कौसर' का जल पिलाकर धन्य कर दें।
शायर के अनुसार, जब हज का महीना आता है और हाजियों की टोली रवाना होती है, तो उसके दिल पर क्या गुज़रती है और वह आक़ा ﷺ से किस चीज़ की फ़रियाद करता है?