मेरे सरकार आए
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टाइटल : भर दो झोली मेरी या मुहम्मद
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: साबरी ब्रदर्स
जोड़ा गया : 09 Apr, 2023 09:06 AM IST
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शाह-ए-मदीना सुनो इल्तिजा ख़ुदा के लिए
करम हो मुझ पे हबीब-ए-ख़ुदा, ख़ुदा के लिए
हुज़ूर ग़ुंचा-ए-उमीद अब तो खिल जाए
तुम्हारे दर का ग़दा हूँ तो भीख मिल जाए
भर दो झोली मेरी या मुहम्मद
लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली
तुम्हारे आस्ताने से ज़माना क्या नहीं पाता
कोई भी दर से ख़ाली माँगने वाला नहीं जाता
भर दो झोली मेरी सरकार-ए-मदीना
भर दो झोली मेरी ताजदार-ए-मदीना
भर दो झोली...
तुम ज़माने के मुख़्तार हो या नबी
बेकसों के मददगार हो या नबी
सबकी सुनते हो, अपने हों या ग़ैर हों
तुम ग़रीबों के ग़मख़्वार हो या नबी
हम हैं रंज-ओ-मुसीबत के मारे हुए
सख़्त मुश्किल में हैं ग़म से हारे हुए
या नबी कुछ ख़ुदारा हमें भीख दो
दर पे आए हैं झोली पसारे हुए
है मुख़ालिफ़ ज़माना, किधर जाएँ हम
हालत-ए-बेकसी किसको दिखलाएँ हम
हम तुम्हारे भिखारी हैं या मुस्तफ़ा
किसके आगे भला हाथ फैलाएँ हम
भर दो झोली मेरी या मुहम्मद
लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली
कुछ नवासों का सदक़ा अता हो
दर पे आया हूँ बनकर सवालि
हक़ से पाई वो शान-ए-करीमी
मरहबा दोनों आलम के वाली
उसकी क़िस्मत का चमका सितारा
जिस पे नज़र-ए-करम तुम ने डाली
ज़िंदगी बख़्श दी बंदगी को
आबरू दीन-ए-हक़ की बचा ली
वो मुहम्मद का प्यारा नवासा
जिसने सज्दे में गर्दन कटा ली
जो इब्न-ए-मुर्तज़ा ने किया काम ख़ूब है
क़ुर्बानी-ए-हुसैन का अंजाम ख़ूब है
क़ुर्बान हो के फ़ातिमा ज़हरा के चैन ने
दीन-ए-ख़ुदा की शान बढ़ाई हुसैन ने
बख़्शी है जिसने मज़हब-ए-इस्लाम को हयात
जितनी अज़ीम हज़रत-ए-शब्बीर की है ज़ात
मैदान-ए-कर्बला में शाह-ए-ख़ुश-ख़िसाल ने
सज्दे में सर कटा के मुहम्मद के लाल ने
हश्र में उनको देखेंगे जिस दम
उम्मती ये कहेंगे ख़ुशी से
आ रहे हैं वो देखो मुहम्मद
जिनके कंधे पे कमली है काली
महशर के रोज़ पेश-ए-ख़ुदा होंगे जिस घड़ी
होगी गुनहगारों में किस दर्जा बेचैनी
आते हुए नबी को जो देखेंगे उम्मती
एक-दूसरे से सब ये कहेंगे ख़ुशी-ख़ुशी
आ रहे हैं वो देखो मुहम्मद
जिनके कंधे पे कमली है काली
सर-ए-महशर गुनहगारों से पूछताछ जिस घड़ी होगी
यक़ीनन हर बशर को अपनी बख़्शिश की पड़ी होगी
सभी को आस उस दिन कमली वाले से लगी होगी
के ऐसे में मुहम्मद की सवारी आ रही होगी
पुकारेगा ज़माना उस घड़ी दुख-दर्द के मारों
ना घबराओ गुनहगारों, ना घबराओ गुनहगारों
आ रहे हैं वो देखो मुहम्मद
जिनके कंधे पे कमली है काली
आशिक़-ए-मुस्तफ़ा की अज़ान में अल्लाह-अल्लाह कितना असर था
सच्चा ये वाक़िया है अज़ान-ए-बिलाल का
एक दिन रसूल-ए-पाक से लोगों ने यूँ कहा
या मुस्तफ़ा, अज़ान ग़लत देते हैं बिलाल
कहिए हुज़ूर, आपका इस में है क्या ख़याल
फ़रमाया मुस्तफ़ा ने ये सच है तो देखिए
वक़्त-ए-सहर की आज अज़ान और कोई दे
हज़रत बिलाल ने जो अज़ान-ए-सहर न दी
क़ुदरत ख़ुदा की देखो ना मुतलक़ सहर हुई
आए नबी के पास कुछ अस्हाब-ए-बसफ़ा
की अर्ज़ मुस्तफ़ा से, ऐ शाह-ए-अंबिया
है क्या सबब सहर न हुई आज मुस्तफ़ा
जिबरील लाए ऐसे में पैग़ाम-ए-किब्रिया
पहले तो मुस्तफ़ा को अदब से किया सलाम
बाद-ए-सलाम उनको ख़ुदा का दिया पैग़ाम
यूँ जिबरील ने कहा ख़ैर-उल-अनाम से
अल्लाह को है प्यार तुम्हारे ग़ुलाम से
फ़रमा रहा है आप से ये रब्ब-ए-ज़ुल-जलाल
होगी ना सुबह, देंगे ना जब तक अज़ान बिलाल
आशिक़-ए-मुस्तफ़ा की अज़ान में अल्लाह-अल्लाह कितना असर था
अर्श वाले भी सुनते थे जिसको
क्या अज़ान थी अज़ान-ए-बिलाली
काश पुरनम से आए नबी में
जीते जी हो बुलावा किसी दिन
हाल-ए-ग़म मुस्तफ़ा को सुनाऊँ
थाम कर उनके रोज़े की जाली
भर दो झोली मेरी या मुहम्मद
लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली
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यह मशहूर क़व्वाली हुज़ूर ﷺ की बारगाह में एक तज़ियाती इल्तिज़ा और फ़रियाद है। इसमें एक बेबस और दुखी उम्मती आक़ा ﷺ के दर पर झोली पसारे खड़ा है, जिसे पूरा यक़ीन है कि दयालु नबी के आस्ताने से कोई भी कभी ख़ाली हाथ वापस नहीं लौटता।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हुज़ूर ﷺ इस ज़माने के मुख़्तार (सर्वशक्तिमान) और ग़रीबों के सच्चे मददगार हैं। जब दुनिया की तकलीफ़ों से इंसान हार जाता है, तो वह नबी के नवासों (हज़रत इमाम हुसैन) का वास्ता देकर अपनी झोली भरने की मिन्नत करता है। कलाम में कर्बला की महान क़ुर्बानी और हज़रत बिलाल (र.अ) की अज़ान के रूहानी असर का ज़िक्र करके हुज़ूर ﷺ की अज़मत को दर्शाया गया है।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| इल्तिज़ा | प्रार्थना / फ़रियाद या निवेदन |
| ग़ुंचा-ए-उमीद | आशा की कली / उम्मीद की कली |
| ग़दा / सवाली | भिखारी / दर का मंगता या याचक |
| मुख़्तार | अधिकार रखने वाला / सक्षम |
| ग़मख़्वार | दुख-दर्द बाँटने वाला / हमदर्द |
| इब्न-ए-मुर्तज़ा | हज़रत अली के बेटे (مرتضیٰ के पुत्र, यानी इमाम हुसैन) |
| हयात | जीवन / ज़िंदगी |
| बशर | मनुष्य / इंसान |
| ख़ैर-उल-अनाम | पूरी सृष्टि में सबसे उत्तम (हुज़ूर ﷺ) |
इस सूफ़ियाना कलाम में एक मोमिन के अटूट विश्वास को दिखाया गया है। शायर 'पुरनम' कहते हैं कि चाहे ज़माना कितना ही ख़िलाफ़ हो जाए, मदीने के ताजदार की रहमत हर मुसीबत को टाल देती है। महशर (कयामत) के मैदान में जब हर इंसान अपनी मुक्ति के लिए बेचैन होगा, तब काली कमली वाले आक़ा ﷺ ही गुनहगारों का सहारा बनेंगे। हुज़ूर ﷺ की मोहब्बत का यह मुक़ाम है कि उनके सच्चे ग़ुलाम हज़रत बिलाल की अज़ान के बिना ख़ुदा ने सुबह की शुरुआत तक रोक दी थी।
वाक़िया-ए-अज़ान-ए-बिलाली के मुताबिक, जब हज़रत बिलाल (र.अ) ने सुबह की अज़ान नहीं दी, तो कायनात में क्या बदलाव आया और जिब्रील (अ.स) क्या पैग़ाम लाए?