اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
जोड़ा गया : 07 Sep, 2025 09:30 AM IST
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बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया,
ज़रा ठहर-ठहर, जगमगाती ये नगर,
ज़रा देखन दे... देखन दे...
बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया...
स्वर्ग लगे अशरफ की नगरिया,
ये मन भावन रात हो,
नींद के एक निर्दोष फरिश्ते,
छोड़ दे मेरा साथ हो,
बिनती करूं तोरे, पइयां पड़त हूं,
मान ले मोरी बात हो,
अभी तो प्यासी है नजरिया,
ज़रा ठहर-ठहर, जगमगाती ये नगर,
ज़रा देखन दे... देखन दे...
बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया... बल बल...
सीमना वाले मखदूम अशरफ, जिनका है अशरफ नाम हो,
जिनके चरण मा व्याकुल मनवा, पाए सदा आराम हो,
अंत समय दर्शन करने दो, सुनो ऐ खास-ओ-आम हो,
अभी न डालो मोरे मुंह पे चदरिया,
ज़रा ठहर-ठहर, जगमगाती ये नगर,
ज़रा देखन दे... देखन दे...
बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया... बल बल...
बादा ही पावन पवित्र जल है,
बड़ी प्यारी नीर हो,
सांझ सवेरे बनती है तक़दीर हो,
अशरफ की गलियों में लगी है,
दीवानों की भीड़ हो,
रहमत की सब पे बरसे देखो रे बदरिया,
ज़रा ठहर-ठहर, जगमगाती ये नगर,
ज़रा देखन दे... देखन दे...
बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया... बल बल...
शाह अलाउल-हक़ के तसद्दुक टल जाती आफ़ात हो,
हज़रत नूरुल-ऐन के सदके बंटती है ख़ैरात हो,
अंजुम-ए-ख़स्ता को भी मिली है नूरानी सौग़ात हो,
जग से न्यारी मखदूम अशरफ की दुवरिया,
ज़रा ठहर-ठहर, जगमगाती ये नगर,
ज़रा देखन दे... देखन दे...
बल बल जाऊं तोरे मैं तो हे बयरिया... बल बल...
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यह मनक़बत हज़रत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी (RA) (किछौछा शरीफ़) की बारगाह में अक़ीदत का एक भावुक नज़राना है। इसमें एक भक्त की अपने पीर के दर को निहारने की तीव्र इच्छा और वहां मिलने वाले रूहानी सुकून का चित्रण है।
कवि किछौछा की हवाओं और वक़्त से इल्तेज़ा करता है कि ज़रा ठहर जाओ, ताकि मैं इस जगमगाती रूहानी नगरी को जी भर कर देख सकूँ। वह मौत के फरिश्ते से भी मोहलत माँगता है कि अभी मेरे चेहरे पर कफ़न की चादर न डालो, क्योंकि मेरी आँखें अभी मखदूम-ए-पाक़ के दीदार की प्यासी हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बल बल जाऊं | न्योछावर होना / कुर्बान जाना |
| बयरिया | ठंडी और मंद हवा |
| पइयां पड़त | पैरों में गिरना / विनती करना |
| व्याकुल मनवा | बेचैन हृदय |
| चदरिया | यहाँ अर्थ है 'कफ़न' या मृत्यु की चादर |
| नीर | जल / पानी |
| तसद्दुक / सदके | के वास्ते / के माध्यम से |
| दुवरिया | चौखट / द्वार |
इस कलाम का सार यह है कि मखदूम अशरफ (RA) की नगरी किसी स्वर्ग से कम नहीं है, जहाँ आने वाले हर दुखी और बेचैन मन को शांति मिलती है। कवि सिमना के दूल्हे के प्रति अपनी दीवानगी ज़ाहिर करते हुए कहता है कि उनकी गलियों में रहमत की घटाएँ बरसती हैं और उनके दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता।
"अभी न डालो मोरे मुंह पे चदरिया"—क्या यह पंक्ति एक सच्चे प्रेमी की अपने महबूब के अंतिम दर्शन की व्याकुलता को बखूबी बयां नहीं करती?