मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 25 Mar, 2023 09:11 AM IST
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ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
याद करते हैं तुमको शाम ओ सहर
बेसहारे सलाम कहते हैं
अल्लाह अल्लाह हुज़ूर की बातें
मरहबा रंगों नूर की बातें
चंद जिनकी बलायें लेता है
और तारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
जब मुहम्मद का नाम आता है
रहमतों का पयाम आता है
लैब हमारे दरुद पढ़ते हैं
दिल हमारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
अल्लाह अल्लाह हुज़ूर के गेसू
भीनी भीनी महकती वो खुशबू
जिनसे मामूर है फीजाये हरसू
वो नज़ारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
ज़ाइरे तैबा तू मदीने में
प्यारे आक़ा से इतना कह देना
आप की गर्द राह को आक़ा
बेसहारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
जिक्र था आखिरी महीने का
तज़किरा चिद गया मदीने का
हाजियों मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
ऐ खुद के हबीब प्यारे रसूल
यह हमारा सलाम कीजिए कबुल
आज महफ़िल में जीतने हाजिर हैं
मिल के सारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा मुस्तफा से कह देना
गम के मारे सलाम कहते हैं
याद करते हैं तुमको शाम ओ सहर
बेसहारे सलाम कहते हैं
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यह भारतीय उपमहाद्वीप की एक अत्यंत लोकप्रिय, भावुक और रूहानी नात शरीफ़ है। इसमें एक बेबस और विरह की अग्नि में जल रहा आशिक़-ए-रसूल, सुबह की ठंडी हवा (सबा) और मदीने जाने वाले यात्रियों के माध्यम से हुज़ूर ﷺ के दरबार में अपना दुखी मन और सलाम भेजता है।
इन पंक्तियों का भाव यह है कि "हे सुबह की पावन हवा (सबा)! तू मदीने जाकर हमारे प्यारे नबी ﷺ से कह देना कि दुनिया के सताए हुए और दुखों से घिरे हुए बेसहारे लोग आपको दिन-रात याद करते हैं और अपना सलाम भेजते हैं।" जब भी मुहम्मद ﷺ का पावन नाम होठों पर आता है, तो मन में ईश्वर की दया का संदेश आता है, जिससे हृदय और वाणी स्वतः ही उनके आदर में लीन हो जाते हैं।
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सबा | सुबह की ठंडी और मंद हवा |
| शाम-ओ-सहर | सुबह और शाम / दिन-रात |
| बलायें लेना | अत्यधिक प्रेम प्रकट करना / न्योछावर होना |
| पयाम | संदेश / पैग़ाम |
| गेसू / हरसू | हुज़ूर ﷺ के पवित्र लंबे बाल / हर तरफ या चारों ओर |
| मामूर | सुवासित / सुगंध से भरा हुआ |
| ज़ाइरे तैबा | मदीना शरीफ़ की यात्रा करने वाले मुसाफ़िर |
| गर्द-ए-राह | रास्ते की धूल या मट्टी |
इस मुक़द्दस कलाम का मुख्य सार यह है कि संसार के तमाम दुखी, पीड़ित और बेसहारे लोग नबी ﷺ के प्रति गहरी आस्था रखते हैं और उनकी कृपा के आकांक्षी हैं। शायर नबी ﷺ की बेमिसाल सुंदरता, उनके महकते केशों और उनकी उस अज़मत की प्रशंसा करता है जहाँ चाँद-तारे भी उनके आगे नतमस्तक हैं। अंत में, वह नात की इस पावन सभा (महफ़िल) में उपस्थित सभी प्रेमियों की ओर से इस प्रार्थना के साथ सामूहिक सलाम पेश करता है कि हुज़ूर ﷺ इसे स्वीकार (क़बूल) फ़रमाएँ।
शायर के मुताबिक, जब नबी-ए-करीम ﷺ का मुबारक नाम लिया जाता है, तो हमारे लबों (होंठों) और दिलों पर इसका क्या असर होता है?