اندھیری رات ہے غم کی گھٹا عصیاں کی کالی ہے
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टाइटल : आक़ा का बदन नूरानी बदन
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : असद इक़बाल कलकत्तावी
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी
जोड़ा गया : 01 Sep, 2025 03:59 PM IST
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आक़ा का बदन नूरानी बदन,
नूरानी बदन लासानी बदन,
आक़ा का बदन नूरानी बदन,
नूरानी बदन लसानी बदन,
लासानी बदन, नूरानी बदन,
लासानी बदन, नूरानी बदन
आका का बदन..., आका का बदन...,
आका का बदन..., आका का बदन...
नबी हैं नूरी दहन वाले,
नबी हैं नूरी सुखन वाले,
नबी हैं नूरी ज़क़न वाले,
नबी हैं नूरी बदन वाले...
आक़ा का बदन नूरानी बदन,
नूरानी बदन लासानी बदन
अनमोल नगीना कहते हैं,
रहमत का दफीना कहते हैं,
आलम का खज़ीना कहते हैं,
जैसे लोग मदीना कहते हैं,
वो शहर-ऐ-नबी है शहर-ऐ-नबी,
रहमत का जहां बरसे सावन
आक़ा का बदन, नूरानी बदन,
नूरानी बदन, लासानी बदन
दिल का गुलदान महकता है,
हर वक्त हर आन महकता है,
तू माने ना मान महकता है,
जिस से ईमान महकता है...
ऐसा है पसीना आका का,
पाए तो महक जाती है दुल्हन...
आक़ा का बदन, नूरानी बदन,
नूरानी बदन, लासानी बदन
हर सुन्नी की है शान रज़ा,
हर आशिक की है जान रज़ा,
है इमानी चट्टान रज़ा,
मारेहरा की पहचान रज़ा,
है अहले सुनन की जान रज़ा,
उस प्यारे नबी के आशिक पे,
क़ुर्बान है अपना तन-मन-धन
आक़ा का बदन, नूरानी बदन,
नूरानी बदन, लासानी बदन
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यह नात हुज़ूर ﷺ की ज़ात-ए-अकदस की अज़मत और उनके नूरानी वजूद की प्रशंसा में लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि
का शरीर, उनकी वाणी और उनका शहर मदीना, पूरी कायनात के लिए बरकत और खुशबू का स्रोत है।
इन पंक्तियों में शायर कहता है कि हुज़ूर ﷺ का बदन नूर से बना है और उसकी कोई मिसाल नहीं है। उनके पसीने की खुशबू इतनी पवित्र और तेज़ है कि वह दुनिया की बेहतरीन खुशबुओं पर भारी है, और आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान जैसे आशिकों ने हमें उसी नूरानी सच्चाई से रूबरू कराया है।
| शब्द (Word) | अर्थ - Meaning (English/Hindi) |
|---|---|
| लासानी (Lasani) | Incomparable / बेमिसाल या अद्वितीय |
| दहन (Dahan) | Mouth / मुँह (पवित्र वाणी के संदर्भ में) |
| सुखन (Sukhan) | Speech / बातचीत या कलाम |
| खज़ीना (Khazeena) | Treasure / खज़ाना |
| दफीना (Dafeena) | Hidden Treasure / गड़ा हुआ खज़ाना |
| अहले सुनन (Ahle Sunan) | Followers of Sunnah / सुन्नत पर चलने वाले |
इस नात का सार यह है कि पैगंबर मोहम्मद ﷺ का व्यक्तित्व और उनका शहर मदीना रहमतों का खज़ाना है। उनके नूरानी वजूद की गवाही उनके पसीने की महक और उनके सच्चे आशिकों (जैसे इमाम अहमद रज़ा) के अटूट ईमान से मिलती है, जो हर सुन्नी मुसलमान के लिए गर्व का विषय है।
नात के आखिर में शायर ने "रज़ा" (इमाम अहमद रज़ा खान) के लिए किन अल्फाज़ का इस्तेमाल किया है, और उनके ऊपर क्या कुर्बान करने की बात की गई है?